लाल आतंक का 'द एंड'! ₹1 करोड़ का मोस्ट वांटेड माओवादी मिसिर बेसरा गिरफ्तार, बिना कोई गोली चले 'ऑपरेशन सुदर्शन' ने रचा इतिहास; श्रेय लेने की मची होड़
झारखंड सहित पूरे देश को लाल आतंक (Left-Wing Extremism) के खौफ से मुक्त कराने की दिशा में सुरक्षा बलों को अब तक की सबसे ऐतिहासिक और निर्णायक सफलता हाथ लगी है। भाकपा (माओवादी) के सर्वोच्च निर्णय लेने वाले संगठन 'पोलित ब्यूरो' के अंतिम सक्रिय सदस्य और देश के सबसे वांटेड नक्सलियों में शुमार मिसिर बेसरा उर्फ भास्कर को खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा बलों के साझा ऑपरेशन में गिरफ्तार कर लिया गया है।
झारखंड सरकार द्वारा 1 करोड़ रुपये और ओडिशा सरकार द्वारा 1.20 करोड़ रुपये के घोषित इनामी मिसिर बेसरा को धनबाद-गिरिडीह सीमा पर स्थित मनियाडीह इलाके से दबोचा गया। इस महा-सफलता के बाद जहां सुरक्षा एजेंसियां इसे नक्सलवाद के खात्मे का टर्निंग पॉइंट मान रही हैं, वहीं अब इस बड़ी कामयाबी का सेहरा अपने सिर बांधने के लिए अलग-अलग विभागों और नेताओं में क्रेडिट लेने की होड़ मच गई है।
'ऑपरेशन सुदर्शन': बिना एक भी गोली चले कैसे जाल में फंसा 1 करोड़ का माओवादी?
मिसिर बेसरा पिछले करीब दो दशकों से सारंडा, कोल्हान और पारसनाथ की दुर्गम पहाड़ियों में एक समानांतर सत्ता चला रहा था। खुफिया एजेंसी आईबी (IB) पिछले कई महीनों से उस पर पैनी नजर रख रही थी। हाल ही में सारंडा और कोल्हान क्षेत्र में सुरक्षा बलों के बढ़ते आक्रामक दबाव और पिछले एक सप्ताह में उसके दस्ते के दर्जनों नक्सलियों के बड़े पैमाने पर किए गए आत्मसमर्पण (Surrender) के बाद मिसिर बेसरा पूरी तरह अलग-थलग पड़ चुका था।
सुरक्षा बलों को पुख्ता इनपुट मिला कि बेसरा अपने दो सहयोगियों—रीजनल कमेटी सदस्य मेहनत उर्फ मोछू (₹15 लाख इनामी) और गौरव उर्फ सौरभ के साथ एक टाटा मैजिक गाड़ी में छिपकर पारसनाथ की पहाड़ियों के रास्ते किसी नए सेफ हाउस की तलाश में भाग रहा है। इसके बाद झारखंड पुलिस, सीआरपीएफ (CRPF), कोबरा कमांडो और झारखंड जगुआर ने संयुक्त रूप से 'ऑपरेशन सुदर्शन' लॉन्च किया। देर रात पूरे इलाके की कड़े तरीके से घेराबंदी की गई और कोबरा कमांडो ने अंधेरे का फायदा उठाकर गाड़ी को चारों तरफ से घेर लिया। अचानक हुई इस सर्जिकल स्ट्राइक से माओवादियों को संभलने या हथियार उठाने का मौका तक नहीं मिला और बिना एक भी राउंड फायर किए तीनों को जिंदा दबोच लिया गया।
55 जवानों की शहादत का जिम्मेदार, 2009 में लखीसराय जेल ब्रेक का मास्टरमाइंड
मिसिर बेसरा का पकड़ा जाना भारतीय सुरक्षा के लिहाज से कितनी बड़ी बात है, इसे उसके खौफनाक इतिहास से समझा जा सकता है:
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150 से अधिक गंभीर मामले: झारखंड, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में उस पर मर्डर, पुलिस पर हमले और आर्म्स एक्ट के 150 से अधिक मुकदमे दर्ज हैं। एनडीआरएफ और एनआईए (NIA) को भी उसकी सरगर्मी से तलाश थी।
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55 सुरक्षाकर्मियों की हत्या: वर्ष 2003-04 में पश्चिम सिंहभूम के बिटकिलसोय और बलिबा में हुए भीषण आईईडी (IED) ब्लास्ट की मुख्य साजिश मिसिर बेसरा ने ही रची थी, जिसमें 55 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए थे।
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लखीसराय कोर्ट परिसर पर हमला: उसे पहली बार 2007 में खूंटी से गिरफ्तार किया गया था, लेकिन 2009 में बिहार के लखीसराय कोर्ट परिसर पर सैकड़ों हथियारबंद नक्सलियों ने दुस्साहसिक हमला कर उसे पुलिस कस्टडी से छुड़ा लिया था, जिसके बाद से वह लगातार फरार था।
क्यों मची है क्रेडिट लेने की होड़?
इतने बड़े इनामी नक्सली की जीवित गिरफ्तारी के बाद से ही प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में श्रेय (Credit) लेने की होड़ लग गई है:
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केंद्रीय बनाम राज्य एजेंसियां: केंद्रीय खुफिया एजेंसी आईबी (IB) और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के अधिकारी जहां इसे अपनी सटीक रणनीतिक घेराबंदी और टेक्निकल सर्विलांस की जीत बता रहे हैं, वहीं झारखंड पुलिस और स्थानीय पुलिस मुख्यालय इसे राज्य सरकार की आक्रामक नीति और जमीनी इनपुट का नतीजा बता रहे हैं।
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आत्मसमर्पण नीति का असर: पुलिस के एक धड़े का मानना है कि डीजीपी के नेतृत्व में हाल ही में 16 कुख्यात नक्सलियों द्वारा भारी मात्रा में अत्याधुनिक हथियारों के साथ किए गए सरेंडर से मिले सुरागों ने इस गिरफ्तारी की नींव रखी, इसलिए मुख्य क्रेडिट पुनर्वास नीति को जाना चाहिए।
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सियासी घमासान: झारखंड के राजनीतिक दलों में भी इस बड़ी कामयाबी को भुनाने की कवायद शुरू हो गई है। सत्ता पक्ष इसे राज्य सरकार की कानून-व्यवस्था की बड़ी नजीर बता रहा है, जबकि विपक्षी खेमा इसे केंद्रीय गृह मंत्रालय और पैरामिलिट्री फोर्सेज के दृढ़ संकल्प की सफलता करार दे रहा है।
माओवादी थिंक टैंक का पूर्ण खात्मा
रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, मिसिर बेसरा भाकपा (माओवादी) का आखिरी सक्रिय पोलित ब्यूरो और केंद्रीय कमेटी सदस्य था जो सुरक्षा बलों की पहुंच से दूर था। इससे पहले प्रमुख कमांडर बसवा राजू को सुरक्षा बल ढेर कर चुके हैं और एक अन्य शीर्ष नेता देव ने फरवरी 2026 में सरेंडर कर दिया था। बेसरा की गिरफ्तारी से न केवल माओवादियों की वैचारिक और रणनीतिक रीढ़ टूट गई है, बल्कि पूर्वी भारत के 'रेड कॉरिडोर' में उनके जबरन वसूली (Extortion) और हथियारों की सप्लाई चेन का नेटवर्क पूरी तरह ध्वस्त हो गया है। अब राज्य में केवल एक करोड़ का इनामी असीम मंडल ही फरार बचा है, जिसके खिलाफ भी पुलिस का घेरा लगातार कड़ा होता जा रहा है।