छत के एंटीना से कॉर्पोरेट पतन तक: कैसे डूबा 90 के दशक का चहेता भारतीय ब्रांड Videocon
सन् 1990 के दशक की यादें भारतीय मध्यम वर्ग के जीवन का वह सुनहरा दौर थीं, जब छत पर लगे एंटीना को घुमाकर टीवी सिग्नल मिलाना हर घर की आम दिनचर्या का हिस्सा हुआ करता था। उस दौर में अगर मोहल्ले के किसी घर में नया कलर टीवी या वॉशिंग मशीन आती, तो उस पर लिखा 'Videocon' नाम सिर्फ एक ब्रांड नहीं, बल्कि उस परिवार की बढ़ती संपन्नता और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बन जाता था। महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व में औरंगाबाद) के एक साधारण कारोबारी परिवार से निकलकर वैश्विक स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक्स साम्राज्य खड़ा करने वाली यह कंपनी कभी हर भारतीय के लिए गर्व की वजह थी।
इस विशाल ब्रांड की नींव वेणुगोपाल धूत के उस विजन पर टिकी थी, जिसने समय से पहले बाजार की नब्ज पकड़ ली थी। 1980 के दशक की शुरुआत में जब पूरा देश ब्लैक-एंड-व्हाइट स्क्रीन का आदी था, धूत ने समझ लिया था कि आने वाला युग रंगीन टीवी का होगा। उन्होंने पारंपरिक खेती और छोटे व्यापार से हटकर इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण का जोखिम उठाया और देखते ही देखते वीडियोकॉन देश के इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार पर छा गया। कंपनी ने टीवी से लेकर फ्रिज, वॉशिंग मशीन और एयर कंडीशनर तक बनाकर भारतीय घरों में अपनी मजबूत पकड़ बना ली।
धीरे धीरे कैसे हुआ कंपनी का पतन
सफलता के शिखर पर पहुंचने के बाद कंपनी की आक्रामक विस्तार नीति ही धीरे-धीरे उसके पतन की वजह बनने लगी। इलेक्ट्रॉनिक्स और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स में अपना दबदबा कायम रखने के बजाय कंपनी ने टेलीकॉम, तेल-गैस उत्खनन और पावर जैसे भारी पूंजी की मांग वाले असंबंधित क्षेत्रों में भारी निवेश करना शुरू किया। भारी-भरकम बैंक कर्ज, 2012 का 2G स्पेक्ट्रम लाइसेंस रद्द होना और तेल प्रोजेक्ट्स में फंसी पूंजी ने कंपनी की बैलेंस शीट को बुरी तरह हिला दिया। गलत फैसलों की इस श्रृंखला ने अंततः कंपनी को दिवालियापन (IBC) की दहलीज पर ला खड़ा किया।
वीडियोकॉन के चर्चित कारोबारों में से एक 'Videocon d2h' का सफर भी अंततः विलय के साथ बदल गया। वर्ष 2018 में वीडियोकॉन d2h का विलय 'Dish TV' के साथ पूरा हुआ, जिसके बाद यह एक स्वतंत्र कंपनी के रूप में समाप्त होकर 'डिश टीवी इंडिया लिमिटेड' का हिस्सा बन गई। हालांकि, बाजार में 'd2h' ब्रांड नाम का उपयोग आज भी जारी है। कॉर्पोरेट पुनर्गठन और कानूनी प्रक्रियाओं के तहत कंपनी का नियंत्रण अब धूत परिवार के पास नहीं रहा और इसका मुख्य कारोबार वेदांता समूह के हाथों में चला गया। कभी घर-घर में गूंजने वाला यह ब्रांड आज कॉर्पोरेट जगत के लिए अनियंत्रित विस्तार और अत्यधिक कर्ज के जोखिमों का बड़ा केस स्टडी बनकर रह गया है।