अब रैंकिंग और देश देखकर विदेश नहीं जा रहे भारतीय छात्र, एक्सपर्ट्स ने किया बड़ा खुलासा

अब रैंकिंग और देश देखकर विदेश नहीं जा रहे भारतीय छात्र, एक्सपर्ट्स ने किया बड़ा खुलासा

विदेशों की यूनिवर्सिटी में उच्च शिक्षा हासिल करने और अपने सुनहरे भविष्य की इबारत लिखने का सपना देखने वाले भारतीय छात्रों की पसंद और प्राथमिकताओं में पिछले कुछ समय से एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल रहा है। कुछ साल पहले तक जहां भारतीय छात्र और उनके माता-पिता किसी भी देश के कॉलेज का चुनाव करते समय मुख्य रूप से उस संस्थान की ग्लोबल रैंकिंग, अमेरिका या ब्रिटेन जैसे देशों के नाम और वहां की चकाचौंध को सबसे बड़ा पैमाना मानते थे, वहीं अब ट्रेंड पूरी तरह से बदल चुका है। आधुनिक शिक्षा विशेषज्ञों और विदेश मामलों के कंसलटेंट्स द्वारा किए गए हालिया खुलासों के अनुसार, आज के समय के भारतीय छात्र और युवा बहुत अधिक 'स्मार्ट' हो चुके हैं और वे भेड़चाल से बाहर निकलकर किसी भी यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने से पहले बेहद व्यावहारिक और दूरदर्शी पहलुओं पर विचार कर रहे हैं। वे केवल कागज पर छपी रैंकिंग के पीछे भागने के बजाय इस बात पर सबसे ज्यादा फोकस कर रहे हैं कि उस कोर्स को पूरा करने के बाद उन्हें असल दुनिया में क्या रिटर्न मिलेगा, उनकी जॉब की सिक्योरिटी कितनी होगी और जिस शहर में वे रहने जा रहे हैं, वहां का कुल खर्च और रहन-सहन कैसा है। इस बदलाव ने न केवल पारंपरिक स्टडी एब्रॉड मार्केट को हिलाकर रख दिया है, बल्कि दुनिया भर के विश्वविद्यालयों को भी अपनी रणनीतियां बदलने पर मजबूर कर दिया है, क्योंकि अब भारतीय छात्र अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई का एक-एक पैसा बहुत सोच-समझकर सही जगह निवेश करना सीख गए हैं।

ग्लोबल रैंकिंग का मोह छोड़ रहे हैं छात्र, जानिए क्यों अब कागजी नंबरों से ज्यादा मायने रखती है व्यावहारिक शिक्षा

पारंपरिक रूप से टाइम्स हायर एजुकेशन या क्यूएस (QS) जैसी ग्लोबल रैंकिंग्स का किसी भी यूनिवर्सिटी के एडमिशन सीजन में एकछत्र राज हुआ करता था, और माता-पिता अपनी जेब ढीली करके उन्हीं संस्थानों को प्राथमिकता देते थे जो टॉप-100 की सूची में ऊपर होते थे। लेकिन पिछले कुछ सत्रों से यह देखा जा रहा है कि भारतीय छात्र इन कागजी रैंकिंग्स के सम्मोहन से बाहर निकल चुके हैं और वे यह समझ चुके हैं कि कई बार ये रैंकिंग्स केवल अकादमिक रिसर्च या भारी-भरकम फंड्स पर आधारित होती हैं, जिनका वास्तविक कॉर्पोरेट जगत या जॉब मार्केट से सीधा लेना-देना नहीं होता है। छात्र अब यह गहराई से टटोल रहे हैं कि जिस फैकल्टी से वे पढ़ने वाले हैं, उनका इंडस्ट्री में कितना अनुभव है, उस संस्थान का स्थानीय उद्योगों के साथ कैसा टाई-अप है और क्या वहां से पढ़ाई करने के बाद कैंपस प्लेसमेंट के वास्तविक अवसर मिलते हैं या नहीं। शिक्षा विशेषज्ञों का यह मानना है कि यह बदलाव इस बात का प्रमाण है कि आज की युवा पीढ़ी मार्केटिंग के झांसे में आने के बजाय जमीनी हकीकत और आंकड़ों पर भरोसा करना ज्यादा पसंद करती है, जिससे वे भविष्य में किसी भी प्रकार के वित्तीय या करियर से जुड़े संकट से बच सकें।

रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (ROI) और स्थानीय जॉब मार्केट बना नया मूलमंत्र, बिना सोचे-समझे खर्च नहीं कर रहे पैरेंट्स

विदेश जाकर पढ़ाई करने में छात्रों और उनके परिवारों की जीवनभर की जमापूंजी या भारी-करोड़ों का बैंक लोन शामिल होता है, और यही कारण है कि आज का भारतीय छात्र हर कदम बहुत नप-तुले तरीके से रख रहा है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, मौजूदा समय में एडमिशन का सबसे बड़ा पैमाना 'रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट' यानी आरओआई (ROI) बन चुका है, जिसका मतलब यह है कि छात्र यह हिसाब लगाते हैं कि वे कॉलेज की फीस पर जितना पैसा खर्च कर रहे हैं, कोर्स खत्म होने के बाद शुरुआती नौकरियों में उन्हें उसका कितना गुना वेतन मिल पाएगा। इसके अलावा, जिस देश या शहर में वे पढ़ने जा रहे हैं, वहां का पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा (Post-Study Work Visa) नियम कैसा है और क्या वहां पर पढ़ाई पूरी होने के बाद कानूनी रूप से नौकरी तलाशने या स्थाई रूप से बसने का पर्याप्त समय मिलता है या नहीं, यह बात कॉलेज के नाम से कहीं ज्यादा ऊपर आ चुकी है। यही वजह है कि पारंपरिक रूप से लोकप्रिय माने जाने वाले कुछ महंगे देशों के बजाय अब छात्र ऐसे वैकल्पिक और उभरते हुए शैक्षणिक गंतव्यों की ओर रुख कर रहे हैं जो कम खर्च में उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा और बेहतर रोजगार के अवसर दोनों चीजें एक साथ उपलब्ध करा रहे हैं।

पार्ट-टाइम जॉब्स, रहने का खर्च और जीवन की सुरक्षा: एडमिशन से पहले इन तीन बातों पर हो रहा है सबसे ज्यादा मंथन

विदेश जाने से पहले भारतीय छात्र अब इंटरनेट पर केवल यूनिवर्सिटी के सिलेबस की जांच नहीं करते, बल्कि वे रेडिट (Reddit), क्वोरा (Quora) और विभिन्न छात्र समुदायों के जरिए वहां के जमीनी हालात का पूरा कच्चा-चिट्ठा खंगालते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आज का छात्र एडमिशन का फॉर्म भरने से पहले मुख्य रूप से तीन बेहद व्यावहारिक बातों पर सबसे ज्यादा गौर कर रहा है, जिसमें पहला है उस शहर में किराए के मकान और खाने-पीने का खर्च, दूसरा है वहां आसानी से मिलने वाली पार्ट-टाइम नौकरियां ताकि पढ़ाई के दौरान अपने खर्च का बोझ खुद उठाया जा सके, और तीसरा है उस देश या इलाके में भारतीय छात्रों के लिए सुरक्षा और सांस्कृतिक अनुकूलता का माहौल। जब छात्र इन सभी पैमानों पर किसी यूनिवर्सिटी और शहर को खरा पाते हैं, तभी वे अपनी फीस जमा करने का अंतिम फैसला लेते हैं। शिक्षा जगत के जानकारों का मानना है कि भारतीय छात्रों की यह नई और व्यावहारिक सोच न केवल उनके व्यक्तिगत भविष्य को सुरक्षित कर रही है, बल्कि ग्लोबल एजुकेशन इंडस्ट्री को भी एक नई दिशा दिखा रही है, जहां अब गुणवत्ता और उपयोगिता ही सफलता का एकमात्र पैमाना बन चुकी है।