हाई-प्रोफाइल केस होते ही क्यों गूंजता है SIT का नाम? आम पुलिस से कैसे अलग है यह स्पेशल टीम और क्या हैं इसकी सुपरपावर्स?
देश में जब भी कोई बड़ा घोटाला, जघन्य अपराध या किसी राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामले का खुलासा होता है, तो हर तरफ एक ही चर्चा शुरू हो जाती है कि मामले की जांच SIT को सौंप दी गई है। हाथरस कांड हो, लखीमपुर खीरी हिंसा या फिर कोई हाई-प्रोफाइल मर्डर मिस्ट्री, सरकार से लेकर देश की सर्वोच्च अदालत तक तुरंत स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम (SIT) के गठन का आदेश दे देती है। ऐसे में हर नागरिक के मन में यह सवाल जरूर उठता है कि आखिर यह SIT आम पुलिस से कितनी अलग होती है और कानून व्यवस्था में इस खास विंग पर इतना बड़ा भरोसा क्यों जताया जाता है।
रूटीन ड्यूटी वर्सेस सिंगल टारगेट: कार्यप्रणाली में होता है जमीन-आसमान का अंतर आम पुलिस यानी हमारे स्थानीय थानों की व्यवस्था के पास कानून-व्यवस्था बनाए रखने, वीआईपी सुरक्षा, त्योहारों पर मुस्तैदी और रोजमर्रा के सैकड़ों छोटे-बड़े अपराधों की जांच करने का भारी प्रशासनिक दबाव होता है। इस वजह से वे किसी एक जटिल मामले पर अपना पूरा वक्त नहीं दे पाते। इसके ठीक विपरीत, SIT कोई स्थाई विभाग नहीं है, बल्कि यह एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई स्पेशल टास्क फोर्स है। SIT के पास केवल एक ही विशिष्ट केस या एक जैसे मामलों का समूह होता है। जब तक वह केस पूरी तरह सुलझ नहीं जाता या उसकी फाइनल रिपोर्ट कोर्ट में पेश नहीं हो जाती, तब तक इस टीम का ध्यान किसी दूसरे काम पर नहीं भटकता।
चुनिंदा दिग्गजों की फौज और असीमित क्षेत्राधिकार की बड़ी ताकत स्थानीय स्तर पर थानों में जो भी जांच अधिकारी (IO) उपलब्ध होता है, उसे नियमानुसार केस सौंप दिया जाता है। लेकिन SIT का गठन बेहद सोच-समझकर किया जाता है। इसमें अलग-अलग विभागों, जिलों या राज्यों से सबसे ईमानदार, तेज-तर्रार और अपने काम में माहिर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को डेपुटेशन पर लाया जाता है। इसके अलावा, आम पुलिस का एक निश्चित थाना क्षेत्र या जिला होता है, जिसकी सीमा से बाहर जाकर जांच करने के लिए उन्हें लंबी कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। वहीं, SIT को सरकार या अदालत द्वारा एक व्यापक क्षेत्राधिकार दिया जाता है, जिससे वे देश के किसी भी कोने में जाकर बिना किसी स्थानीय हस्तक्षेप के साक्ष्य जुटा सकते हैं और अपराधियों को दबोच सकते हैं।
तकनीकी रूप से हाईटेक और सीधा कोर्ट को रिपोर्टिंग का सबसे मजबूत ढांचा SIT की सफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण उसकी हाई अकाउंटेबिलिटी और आधुनिक संसाधन हैं। साधारण थानों के पास फॉरेंसिक लैब्स, साइबर डेटा एनालिसिस टूल्स या बड़े वित्तीय दस्तावेजों को खंगालने के लिए चार्टर्ड अकाउंटेंट्स (CA) जैसे विशेषज्ञ तत्काल उपलब्ध नहीं होते, जबकि SIT को असीमित बजट के साथ-साथ इन सभी एक्सपर्ट्स की एक पूरी फौज मुहैया कराई जाती है। सबसे खास बात यह है कि आम पुलिस की तरह इन्हें अपने लोकल इंस्पेक्टर या डीएसपी को रिपोर्ट नहीं करना होता। SIT सीधे राज्य के डीजीपी, गृह मंत्रालय या मामले की निगरानी कर रही अदालत (सुप्रीम कोर्ट/हाई कोर्ट) को अपनी प्रोग्रेस रिपोर्ट सौंपती है। यह टीम पूरी तरह से अस्थाई होती है और कोर्ट में अंतिम चार्जशीट दाखिल होते ही इसे भंग कर दिया जाता है, जिससे जांच पूरी तरह निष्पक्ष और राजनीतिक दबाव से मुक्त रहती है।