लॉक-डाउन: अपने ही आदेश से पलटी मोदी सरकार, बिना काम नहीं मिलेगा कार्मिकों का वेतन !

लखनऊ। सत्ता की संवेदनहीनता का सबसे ज्यादा शिकार मेहनतकश तबका हुआ है। सरकार मजदूरों को बेसहारा छोड़कर अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है। चौथे चरण के लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही केन्द्र सरकार ने काम न करने की स्थिति में मजदूरों और कर्मचारियों को वेतन नहीं देने का फ़रमान जारी किया है। इसके साथ ही केंद्र तथा प्रदेश के कर्मचारियों की छटनी की प्रक्रिया भी शुरू होने वाली है।

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उल्लेखनीय है कि गत 29 मार्च को केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया था कि कारखाना, दुकान या वाणिज्यिक प्रतिष्ठान के प्रबंधक या स्वामी द्वारा लॉकडाउन अवधि में श्रमिकों का वेतन भुगतान नहीं किया जाता तो महामारी अधिनियम की धारा 3 में प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करके भारतीय दण्ड़ संहिता की धारा 188 के तहत एफआईआर दर्ज की जाए। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों ने भी आदेश दिए थे। हालांकि इसका अनुपालन बेहद कम ही हुआ।

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गत 17 मई को केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना में इस आदेश को खत्म कर दिया गया है। सरकार के दिशा निर्देश के अनुसार लॉकडाउन के दौरान बैंक, बीमा, केन्द्रीय व राज्य कर्मचारियों की मात्र 33 प्रतिशत उपस्थिति होनी है। उद्योगों में दो तिहाई मजदूर ही बुलाये जायेंगे। इसका अनुपालन न करने वाले प्रतिष्ठानों के विरूद्ध आपदा अधिनियम 1897 की धारा 3 के तहत सख्त कार्रवाई की जायेगी। यदि सरकार के इन आदेशों के अनुरूप किसी दिन अनुपस्थित रहने वाले कर्मचारी या मजदूर के वेतन का क्या होगा? जानकारों के अनुसार ऐसे कर्मचारियों व मजदूरों को वेतन का भुगतान नहीं होगा।

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इसी तरह गत मंगलवार को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि केन्द्र की वित्तीय मदद से चलने वाली योजनाओं में केन्द्र से धन प्राप्त होने पर ही धनराशि आवश्यकतानुसार चरणों में उपलब्ध करायी जायेगी। इसका सबसे बुरा असर मनरेगा पर पड़ेगा। क्योंकि यह योजना पूर्णतया केन्द्र सरकार द्वारा संचालित है। केंद्र सरकार ने 20 लाख करोड़ के पैकेज में मनरेगा को महज 40 हजार करोड़ रुपये का आवंटन किया है। वित्त मंत्री ने अपने बजट में भी मनरेगा मद में 11 हजार करोड़ की कटौती की थी।

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वित्त विभाग द्वारा जारी इस आदेश में कहा गया है कि सभी विभागों द्वारा सिर्फ अपरिहार्य योजनाओं का ही क्रियान्वित किया जाए। नई निर्माण परियोजना के शुरू करने पर रोक लगाते हुए कहा गया है कि जो कार्य प्रारम्भ किए जा चुके हैं वही कार्य कराए जाएं। आदेश के बिंदु संख्या चार में कहा गया है कि कार्य प्रणाली में परिवर्तन, सूचना प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग आदि के कारणों से सरकारी विभागों में अनेक पद अप्रासंगिक हो गए हैं। इन पदों को चिन्हित कर इन्हें समाप्त किया जाये। कार्यरत कर्मचारियों को अन्य विभागों में रिक्त पदों पर समायोजित किया जाए। बिंदु संख्या पांच में आवश्यक कार्यों को आउटसोर्सिंग से करने की बात कही गई है। इसी तरह बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग में 62 साल से ज्यादा उम्र वालों की छटनी की तैयारी शुरू हो चुकी है।

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इससे पहले यूपी सरकार ने काम के घंटे बारह करके 33 प्रतिशत श्रमिकों व कर्मचारियों की छंटनी का फैसला किया था, जिस पर वर्कर्स फ़्रंट के हाईकोर्ट में हस्तक्षेप के बाद सरकार को बैकफुट पर आकर आदेश वापस लेना पड़ा। अभी भी सरकार 38 में से 35 श्रम कानूनों को तीन साल तक स्थगित करने की कोशिश में लगी है, लेकिन आज तक वह इस सम्बंध में अध्यादेश नहीं ला पायी है। इन हालातों में प्रदेश में आ रहे लाखों प्रवासी मजदूरों की आजीविका व रोजगार की व्यवस्था करने की योगी सरकार की घोषणाओं की हकीकत को समझा जा सकता है।

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