क्या युद्धग्रस्त समुद्री रास्तों पर जाने से मना कर सकते हैं भारतीय नाविक?
वैश्विक तनाव और समुद्र में बढ़ते खतरों के बीच यह सवाल हर भारतीय नाविक और उनके परिवारों को परेशान कर रहा है। लाल सागर (Red Sea) में जहाजों पर हो रहे ड्रोन हमलों और अन्य युद्धग्रस्त क्षेत्रों (War Zones) में सुरक्षा जोखिमों को देखते हुए नाविकों की जान हमेशा जोखिम में रहती है। ऐसे में कानूनन हर मर्चेंट नेवी प्रोफेशनल के पास कुछ अधिकार होते हैं, लेकिन क्या व्यावहारिक तौर पर वे अंतरराष्ट्रीय पानी में डेंजर जोन में जाने वाले शिप पर चढ़ने से इनकार कर सकते हैं? आइए समझते हैं कि इस मामले में कानून क्या कहता है और धरातल पर हकीकत कितनी जुदा है।
क्या है 'राइट टू रिफ्यूज' कानून और भारतीय महानिदेशालय (DG Shipping) के नियम?
अंतरराष्ट्रीय समुद्री श्रम कानून (Maritime Labour Convention - MLC) और भारत के नौवहन महानिदेशालय (Directorate General of Shipping) के नियमों के अनुसार, नाविकों को 'राइट टू रिफ्यूज' (Right to Refuse) यानी किसी भी घोषित युद्धग्रस्त या अत्यधिक जोखिम वाले क्षेत्र (High-Risk Area) में जाने से मना करने का स्पष्ट कानूनी अधिकार प्राप्त है।
यदि किसी शिपिंग कंपनी का जहाज ऐसे रास्ते से गुजरने वाला है जिसे आधिकारिक तौर पर 'वार जोन' घोषित किया जा चुका है, तो कंपनी को अपने क्रू (चालक दल) को इसकी लिखित जानकारी पहले देनी होती है। नाविकों के पास अधिकार होता है कि वे उस रूट पर जाने से इनकार कर दें। यदि वे मना करते हैं, तो कंपनी की यह कानूनी जिम्मेदारी बनती है कि वह उन्हें अपने खर्चे पर सुरक्षित रूप से वापस उनके देश (Repatriation) भेजे और उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न करे। इसके अलावा, जो नाविक स्वेच्छा से वहां जाने को तैयार होते हैं, वे डबल बेसिक सैलरी (Double Pay) और मृत्यु या अपंगता की स्थिति में दोगुने मुआवजे के हकदार होते हैं।
कागजी कानून से कितनी अलग है समुद्री जीवन की कड़वी हकीकत?
कागजों पर 'राइट टू रिफ्यूज' का नियम जितना मजबूत दिखाई देता है, असल जिंदगी में मर्चेंट नेवी के कर्मचारियों के लिए इसका इस्तेमाल करना उतना ही पेचीदा और नुकसानदेह साबित होता है। हकीकत यह है कि अगर कोई जूनियर ऑफिसर या क्रू मेंबर युद्ध क्षेत्र में जाने से मना करता है, तो भले ही कंपनी सीधे तौर पर कोई कानूनी कार्रवाई न करे, लेकिन नाविक का करियर दांव पर लग जाता है।
शिपिंग कंपनियाँ अक्सर ऐसे नाविकों को 'नॉन-कोऑपरेटिव' (सहयोग न करने वाला) मान लेती हैं। इसके बाद भविष्य में उन्हें अगली नौकरी (Sign-on) मिलने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। कई बार अनऑफिशियल तरीके से उन्हें ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता है या उनकी कॉन्ट्रैक्ट रिपोर्ट खराब कर दी जाती है। बेरोजगारी के डर और होम लोन व परिवार की जिम्मेदारियों के दबाव में आकर ज्यादातर भारतीय नाविक अपनी जान जोखिम में डालकर भी उन खतरनाक रास्तों पर जाने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
रिप्लेसमेंट की कमी और ऐन वक्त पर रूट बदलने का खेल
समुद्र के बीचों-बीच हकीकत बदलने का एक और बड़ा कारण है 'रूट डायवर्जन'। कई बार नाविक जब पोर्ट से जहाज पर सवार होते हैं, तब रूट सामान्य होता है। लेकिन यात्रा के बीच में अचानक भू-राजनीतिक (Geopolitical) हालात बिगड़ने पर जहाज का रास्ता किसी जोखिम भरे क्षेत्र की तरफ मोड़ दिया जाता है।
ऐसी स्थिति में समुद्र के बीच से किसी नाविक को रिप्लेस करना या उसे वापस घर भेजना व्यावहारिक रूप से नामुमकिन हो जाता है। जहाज पर मौजूद क्रू के पास कैप्टन और कंपनी के आदेश को मानने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता। यही वजह है कि कानूनी कवच होने के बावजूद भारतीय नाविक आज भी वैश्विक युद्धों के बीच अनचाहे खतरों का सामना करने को मजबूर हैं।