परिसीमन पर कांग्रेस के बदले तेवर! सरकार से पूछा- नया प्रस्ताव है या फिर वही पुराना बिल

परिसीमन पर कांग्रेस के बदले तेवर! सरकार से पूछा- नया प्रस्ताव है या फिर वही पुराना बिल

भारतीय राजनीति के गलियारों में इन दिनों 'परिसीमन' (Delimitation) यानी लोकसभा और विधानसभा सीटों के पुनर्गठन का मुद्दा एक बार फिर सबसे बड़ा राजनीतिक भूचाल बनकर उभर रहा है। संसद से लेकर सड़क तक इस संवेदनशील विषय पर चर्चाएं तेज हो चुकी हैं, और विपक्षी दलों ने इस पर अपनी रणनीति को धार देना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने परिसीमन के मुद्दे पर अपने पुराने रुख में बदलाव लाते हुए सरकार के खिलाफ बेहद आक्रामक और तीखे तेवर अख्तियार कर लिए हैं। कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने केंद्र सरकार से सीधे तौर पर यह सवाल पूछा है कि वे जिस नए परिसीमन प्रस्ताव की बात कर रहे हैं, वह देश की जनता के सामने स्पष्ट किया जाए कि क्या यह कोई नया और सर्वसम्मत प्रस्ताव है या फिर वही पुराना और विवादास्पद बिल है जिसे लेकर पहले ही देश के कई राज्यों, खासकर दक्षिण और पूर्वी भारत में भारी विरोध और चिंता व्यक्त की जा चुकी है। इस राजनीतिक बयानबाजी ने एक बार फिर केंद्र और विपक्ष के बीच टकराव के नए रास्ते खोल दिए हैं, जिससे आने वाले दिनों में संसद के भीतर और बाहर भारी हंगामा होने के पूरे आसार नजर आ रहे हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कि परिसीमन को लेकर कांग्रेस पार्टी की यह ताजा रणनीति क्या है और इसके पीछे के असली सियासी मायने क्या हैं।

दक्षिण भारत के राज्यों की चिंताओं और आबादी के असंतुलन पर कांग्रेस का बड़ा सवाल

कांग्रेस पार्टी द्वारा उठाए गए इस नए सवाल के केंद्र में देश के दक्षिणी राज्यों की वह गहरी चिंता है जो जनसंख्या नियंत्रण के सफल क्रियान्वयन के बाद परिसीमन के नाम पर अपनी राजनीतिक ताकत और लोकसभा सीटों के घटने की आशंका को लेकर लगातार जताई जा रही है। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि जिन राज्यों ने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय लक्ष्यों को पूरी ईमानदारी के साथ लागू किया और अपने यहां आबादी को नियंत्रित किया, यदि परिसीमन के बाद उन्हीं राज्यों की लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या में कमी कर दी जाती है, तो यह उन राज्यों के साथ एक बहुत बड़ा अन्याय होगा। पार्टी का कहना है कि केंद्र सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि नए परिसीमन का आधार क्या केवल और केवल बढ़ती हुई जनसंख्या को ही बनाया जाएगा या फिर इसमें संघीय ढांचे (Federal Structure), क्षेत्रीय संतुलन और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व के अन्य मानकों का भी ध्यान रखा जाएगा। यही वजह है कि कांग्रेस अब इस मुद्दे पर किसी भी प्रकार के जल्दबाजी भरे कदम का विरोध करने के लिए पूरी तरह से तैयार नजर आ रही है।

क्या है वह पुराना बिल और क्यों इसे लेकर देश के राजनीतिक गलियारों में मचा था भारी बवाल

राजनीतिक इतिहास के पन्नों को पलटें तो परिसीमन और सीटों के पुनर्गठन को लेकर दशकों से बहस चलती रही है। पूर्ववर्ती सरकारों के समय भी जब इस दिशा में चर्चाएं शुरू हुई थीं, तब विशेष तौर पर गैर-हिंदी भाषी राज्यों और दक्षिणी भारत के दलों ने इस पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका यह साफ मानना था कि यदि सीटों का निर्धारण केवल और केवल वर्तमान जनगणना के आंकड़ों और कुल जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो उत्तर भारत के अधिक आबादी वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व संसद में बहुत अधिक बढ़ जाएगा, जबकि दक्षिण के राज्य राजनीतिक रूप से कमजोर हो जाएंगे। कांग्रेस पार्टी अब इसी पुराने और संवेदनशील बिंदु को दोबारा उठाते हुए सरकार से यह मांग कर रही है कि वह संसद के पटल पर या सर्वदलीय बैठक में इस बात का आधिकारिक खुलासा करे कि उनका नया प्रस्ताव पिछले वाले ड्राफ्ट से किस प्रकार भिन्न या बेहतर है। पार्टी का आरोप है कि सरकार बिना किसी पारदर्शी चर्चा के इस अति-संवेदनशील मामले को थोपने की कोशिश कर रही है, जिसे कांग्रेस कतई बर्दाश्त नहीं करेगी।

आगामी संसद सत्र और राजनीतिक दलों की रणनीति, देश के भविष्य पर पड़ेगा सीधा असर

आगामी संसद सत्र के दौरान परिसीमन का यह मुद्दा सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सबसे बड़ा वैचारिक और राजनीतिक अखाड़ा बनने की पूरी संभावना है। एक तरफ जहां केंद्र सरकार अपने प्रशासनिक एजेंडे और संवैधानिक प्रक्रियाओं के तहत इस पूरी कवायद को देश के संतुलित विकास और आधुनिकीकरण के लिए आवश्यक बता रही है, वहीं विपक्ष इसे देश के संघीय ढांचे और क्षेत्रीय संतुलन को नुकसान पहुंचाने वाला कदम करार दे रहा है। कांग्रेस के इन बदले हुए और आक्रामक तेवरों ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा केवल संसद की दीवारों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे एक बड़े राष्ट्रीय और जन-आंदोलन का रूप दिया जा सकता है। देश के आम नागरिकों, राजनीतिक विश्लेषकों और विभिन्न राज्यों की सरकारों की निगाहें अब पूरी तरह से इस बात पर टिकी हैं कि केंद्र सरकार कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के इन तीखे सवालों का क्या और किस प्रकार जवाब देती है।