तारीख पर तारीख... सुप्रीम कोर्ट में दशकों से लटके हैं 10,000 से ज्यादा मुकदमे, हाईकोर्ट्स का हाल और बेहाल; कैसे मिलेगा आम आदमी को इंसाफ?
भारत की न्यायिक व्यवस्था में सालों से चली आ रही 'तारीख पर तारीख' की संस्कृति आज आम आदमी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुकी है। देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) से लेकर विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों (हाईकोर्ट्स) तक, न्याय की आस में तीन-तीन, चार-चार दशकों से मुकदमे धूल फांक रहे हैं। हाल ही में सामने आए आधिकारिक आंकड़ों ने देश की अदालतों में लंबित मामलों (Pending Cases) की एक ऐसी भयावह तस्वीर पेश की है, जिसने न्याय प्रणाली की रफ्तार और आम आदमी को समय पर इंसाफ मिलने की उम्मीदों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इंसाफ की इस धीमी रफ्तार के कारण कई बार तो याचिकाकर्ता की मृत्यु हो जाती है, लेकिन फैसला नहीं आ पाता।
सुप्रीम कोर्ट में 30 से 40 साल पुराने 10 हजार से ज्यादा मुकदमे पेंडिंग एक आम धारणा है कि सर्वोच्च अदालत में मामले तेजी से सुलझते हैं, लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में इस समय 10,000 से भी अधिक ऐसे मामले लंबित हैं, जो पिछले 30 से 40 साल या उससे भी अधिक समय से न्याय का इंतजार कर रहे हैं। इनमें से कई मामले ऐसे हैं जो 1980 और 1990 के दशक के हैं। जटिल कानूनी प्रक्रियाएं, जजों की कमी, बार-बार वकीलों द्वारा ली जाने वाली तारीखें और बड़ी संवैधानिक पीठों (Constitutional Benches) के गठन में होने वाली देरी के कारण देश की सबसे बड़ी अदालत में भी न्याय का तराजू बेहद धीमी गति से डोल रहा है।
हाईकोर्ट्स में और भयावह हैं हालात, 80 हजार से ज्यादा मामले दशकों से अटके सुप्रीम कोर्ट से इतर अगर राज्यों के उच्च न्यायालयों (High Courts) की बात करें, तो वहां स्थिति और भी ज्यादा चिंताजनक बनी हुई है। देश के विभिन्न हाईकोर्ट्स में 80,000 से अधिक मामले ऐसे हैं, जो पिछले तीन दशकों से ज्यादा समय से लंबित हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट, कलकत्ता हाईकोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट जैसे देश के सबसे बड़े और पुराने उच्च न्यायालयों में लंबित मुकदमों का बोझ सबसे ज्यादा है। निचली अदालतों से अपील होकर आने वाले इन मामलों में कई पीढ़ियां गुजर चुकी हैं, लेकिन अदालत की चौखट पर न्याय की गुहार अब भी जारी है। कई मामलों में तो केस की फाइलें और सबूत तक समय के साथ धुंधले पड़ चुके हैं।
जजों की भारी कमी और बुनियादी ढांचे का अभाव है इस अंतहीन देरी की असली वजह कानूनी विशेषज्ञों और न्यायविदों के अनुसार, अदालतों में मुकदमों के इस अंबार के पीछे सबसे मुख्य वजह स्वीकृत पदों के मुकाबले जजों की भारी कमी है। देश के लगभग सभी उच्च न्यायालयों में जजों के दर्जनों पद सालों से खाली पड़े हैं, जिन पर कॉलेजियम और सरकार के बीच खींचतान के चलते समय पर नियुक्तियां नहीं हो पाती हैं। इसके अलावा, भारत में प्रति दस लाख की आबादी पर जजों की संख्या विकसित देशों की तुलना में बेहद कम है। अदालतों में आधुनिक तकनीक, डिजिटल रिकॉर्ड कीपिंग और फॉरेंसिक इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव भी जांच और सुनवाई की प्रक्रिया को महीनों और सालों तक खींच देता है।
कैसे सुधरेगी व्यवस्था और आम आदमी को कैसे मिलेगा समय पर न्याय? 'जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड' (देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है) की कहावत को बदलने के लिए न्याय प्रणाली में बड़े और कड़े सुधारों की जरूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट्स में खाली पड़े जजों के पदों को युद्धस्तर पर भरा जाना चाहिए। इसके साथ ही, अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ई-कोर्ट्स (E-Courts) तकनीक को बढ़ावा देकर रूटीन मामलों का निपटारा तेजी से किया जा सकता है। मध्यस्थता (Mediation) और लोक अदालतों के जरिए छोटे और दीवानी मुकदमों को अदालत से बाहर सुलझाने पर जोर देना होगा, ताकि उच्च अदालतों पर से मुकदमों का यह ऐतिहासिक बोझ कम हो सके और देश के आम नागरिक को सही समय पर सच्चा न्याय मिल सके।