नेहरू की 'एक गलती' से हाथ से निकल गया ग्वादर? जानिए क्या है बलूचिस्तान के इस अहम पोर्ट का इतिहास और भारत से कनेक्शन

नेहरू की 'एक गलती' से हाथ से निकल गया ग्वादर? जानिए क्या है बलूचिस्तान के इस अहम पोर्ट का इतिहास और भारत से कनेक्शन

आज के दौर में पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित ग्वादर पोर्ट (Gwadar Port) पर चीन का कब्जा है और यहीं से बहुचर्चित चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) गुजरता है। इस पोर्ट के जरिए चीन अरब सागर और पश्चिम एशिया तक अपनी सीधी पैठ बना चुका है। लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटें तो एक ऐसा दौर भी था जब ग्वादर भारत का हिस्सा बन सकता था या फिर भारत के नियंत्रण में आ सकता था। जानकारों और भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शुरुआती दौर में कुछ कूटनीतिक फैसले सही लिए जाते, तो आज पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व में भारत का सिक्का चल रहा होता।

क्या था ग्वादर का इतिहास और भारत से उसका नाता?

कहानी साल 1947 की आजादी के ठीक बाद की है। जब देश का विभाजन हुआ, तब मस्कट और ओमान के सुल्तान के नियंत्रण में आने वाला 'ग्वादर' एक छोटा सा तटीय इलाका हुआ करता था। तकनीकी और भौगोलिक रूप से यह बलूचिस्तान के तट पर स्थित था, लेकिन इस पर ओमान के शाही परिवार का शासन था। 1950 के दशक के शुरुआती सालों में ओमान के सुल्तान भारत के साथ बेहद करीबी रिश्ते रखते थे और वे चाहते थे कि इस बंदरगाह को भारत या ब्रिटिश शासन के सहयोग से मैनेज किया जाए। उस समय भारत के पास इस क्षेत्र को अपने अधिकार क्षेत्र में लेने या खरीदने का सुनहरा मौका था।

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का वह 'फैसला'

इतिहासकारों के मुताबिक, जब ओमान की तरफ से ग्वादर को भारत को सौंपने या बेचने की अनौपचारिक पेशकश की गई थी, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। नेहरू का मानना था कि भारत को अपनी घरेलू सीमाओं और आंतरिक मामलों पर ध्यान देना चाहिए और इस तरह के दूर-दराज के तटीय क्षेत्रों या बस्तियों का अधिग्रहण देश की विदेश नीति और आर्थिक प्राथमिकताओं के अनुकूल नहीं है। भारत की तरफ से कोई ठोस पहल न होने के कारण ओमान के सुल्तान ने विकल्प तलाशना शुरू कर दिया।

पाकिस्तान ने कैसे हथियाया ग्वादर पोर्ट?

जब भारत ने इस प्रस्ताव में रुचि नहीं दिखाई, तब पाकिस्तान के शासकों ने कूटनीतिक चाल चली। साल 1958 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री फिरोज खान नून की पहल पर पाकिस्तान सरकार ने ओमान के सुल्तान के साथ सौदा किया। पाकिस्तान ने लगभग 30 लाख पाउंड (करीब 5.5 करोड़ रुपये उस समय के हिसाब से) की भारी-भरकम कीमत चुकाकर ओमान से ग्वादर को खरीद लिया। इस तरह 8 दिसंबर 1958 को ग्वादर आधिकारिक रूप से पाकिस्तान के नियंत्रण में आ गया। यदि तब भारत ने यह सौदा कर लिया होता, तो आज अरब सागर की भू-राजनीतिक स्थिति पूरी तरह से अलग होती।

अगर ग्वादर भारत के पास होता, तो क्या बदल जाता?

विश्लेषकों का कहना है कि अगर ग्वादर पोर्ट भारत के पास होता, तो आज भारत की सामरिक और आर्थिक ताकत कई गुना ज्यादा होती:

  • पश्चिम एशिया पर मजबूत पकड़: भारत की पहुंच सीधे तौर पर फारस की खाड़ी और मध्य एशिया तक होती, जिससे तेल आपूर्ति और व्यापारिक मार्ग पूरी तरह सुरक्षित रहते।

  • CPEC का वजूद ही नहीं होता: चीन आज जिस CPEC के दम पर पाकिस्तान में अपने पैर फैलाए बैठा है और ग्वादर के जरिए भारत को घेरने की चाल चलता है, वह कभी संभव ही नहीं हो पाता।

  • कम होती समुद्री सुरक्षा चिंताएं: आज हिंद महासागर में चीनी नौसेना (PLA Navy) की बढ़ती गतिविधियों का जो सिरदर्द भारत को उठाना पड़ता है, वह नहीं होता और भारत इस क्षेत्र का निर्विवाद सुरक्षा गार्ड होता।

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