क्या वाकई मनहूस है महीने की 26 तारीख? देश और दुनिया की भयंकर आपदाओं से जुड़ा है इसका इतिहास

क्या वाकई मनहूस है महीने की 26 तारीख? देश और दुनिया की भयंकर आपदाओं से जुड़ा है इसका इतिहास

इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो कई बार कुछ ऐसी तारीखें सामने आती हैं जिन्हें याद करते ही रूह कांप जाती है। इंसान हमेशा से तारीखों, अंकों, ज्योतिष और शगुन-अपशगुन में यकीन करता आया है, लेकिन जब किसी विशेष अंक या तारीख पर लगातार बड़े पैमाने पर तबाही और मौत का तांडव देखने को मिले, तो लोगों का सहम जाना स्वाभाविक है। ऐसी ही एक तारीख इन दिनों चर्चा के केंद्र में है और वह है महीने की '26 तारीख'। अगर आप पिछले कुछ दशकों के इतिहास पर नजर डालें, तो पाएंगे कि दुनिया भर में जितनी भी भीषण प्राकृतिक आपदाएं, सुनामी, बड़े भूकंप, आंतकवादी हमले या मानव जनित महाविनाश हुए हैं, उनमें से एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी 26 तारीख को घटित हुआ है। जापान की सूनामी से लेकर मुंबई के 26/11 आतंकवादी हमले तक और गुजरात के भूकंप से लेकर अन्य भयानक दुर्घटनाओं तक, 26 अंक के साथ एक अजीब और खौफनाक रहस्य जुड़ा हुआ है। क्या यह महज एक इत्तेफाक है या इसके पीछे प्रकृति का कोई ऐसा चक्र छिपा है जो हर बार इसी तारीख को कहर बनकर टूटता है? यही सवाल आज हर किसी के जेहन में एक बड़ा डर पैदा कर रहा है।

26 जनवरी 2001: गुजरात में आया वह भूकंप जिसने धरती को चीर कर रख दिया था

इस खौफनाक सिलसिले की शुरुआत अगर भारतीय संदर्भ में की जाए, तो 26 जनवरी 2001 का वह काला दिन आज भी लोगों के जेहन में जिंदा है। जब पूरा देश भारत का गणतंत्र दिवस मना रहा था और चारों तरफ देशभक्ति का जश्न चल रहा था, ठीक उसी सुबह गुजरात के भुज इलाके में धरती का सीना ऐसा फटा कि पलभर में सब कुछ मलबे के ढेर में बदल गया। रिक्टर स्केल पर 7.7 की तीव्रता वाले इस भीषण भूकंप ने कच्छ और उसके आसपास के इलाकों को पूरी तरह तबाह कर दिया था। हजारों बेकसूर लोगों की मौत हो गई थी, लाखों लोग बेघर हो गए थे और दर्जनों इमारतें ताश के पत्तों की तरह ढह गई थीं। गणतंत्र दिवस की खुशियां कुछ ही सेकंड में चीख-पुकार और मातम में तब्दील हो गईं। संयोग देखिए कि उस दिन भी तारीख 26 ही थी। इस आपदा ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था और आज भी जब लोग 26 जनवरी का नाम सुनते हैं, तो राष्ट्रध्वज फहराने की खुशी के साथ-साथ उस दर्दनाक सुबह का खौफ उनकी आंखों के सामने तैर जाता है।

26 दिसंबर 2004: महासुनामी का तांडव और समुद्र का विकराल रूप

भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया के इतिहास में 26 दिसंबर 2004 का दिन इंसानी सभ्यता पर आए सबसे बड़े प्राकृतिक संकटों में गिना जाता है। इस दिन इंडोनेशिया के सुमात्रा तट के पास हिंद महासागर में आए अब तक के सबसे शक्तिशाली भूकंपों में से एक ने जन्म लिया, जिसके बाद उठी विशालकाय और खौफनाक सुनामी लहरों ने भारत, श्रीलंका, इंडोनेशिया और थाईलैंड समेत कई देशों के तटीय इलाकों को अपनी चपेट में ले लिया। पानी की सैकड़ों फीट ऊंची दीवारों ने तटों पर बसी बस्तियों को पलभर में ऐसे निगल लिया जैसे वहां कुछ था ही नहीं। इस जल प्रलय में ढाई लाख से अधिक लोगों की जान चली गई और लाखों परिवार हमेशा के लिए उजड़ गए। क्रिसमस की छुट्टियों का आनंद ले रहे पर्यटक और समुद्र किनारे रहने वाले गरीब मछुआरे इस भयानक आपदा का शिकार बन गए। इस बार भी तारीख वही थी - 26 दिसंबर। इस महाविनाश ने पूरी दुनिया को यह अहसास करा दिया कि प्रकृति जब अपना रौद्र रूप दिखाती है, तो इंसान कितना लाचार हो जाता है।

मुंबई का 26/11 हमला: इतिहास का सबसे काला और दर्दनाक आतंकवादी अध्याय

प्राकृतिक आपदाओं के अलावा आतंकवाद के इतिहास में भी 26 का अंक एक बहुत बड़ा जख्म छोड़ गया है। 26 नवंबर 2008 की वह काली रात भला कौन भूल सकता है जब पाकिस्तान से आए खूंखार आतंकवादियों ने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को गोलियों और बम धमाकों से दहला दिया था। ताज होटल, ओबेरॉय होटल, छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस और नरीमन हाउस जैसे प्रमुख ठिकानों पर हुए इन अंधाधुंध हमलों ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इस कायराना हमले में कई विदेशी नागरिकों सहित देश के कई वीर पुलिसकर्मी और बेकसूर नागरिक शहीद हो गए थे। कई दिनों तक चली इस खूनी जंग ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को हिलाकर रख दिया था। मुंबई के उस दर्दनाक हमले को आज भी '26/11' के नाम से याद किया जाता है। तारीख के रूप में दर्ज यह अंक इस बात का प्रतीक बन गया कि कैसे इंसान द्वारा फैलाई गई हिंसा भी इसी विशेष तारीख पर अपने सबसे भयानक रूप में सामने आई थी।

संयोग, अंधविश्वास या विज्ञान: क्या वाकई कोई मनहूसियत है?

जब एक ही तारीख पर बार-बार इतनी बड़ी तबाही, युद्ध, सुनामी और हादसे सामने आते हैं, तो आम आदमी के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कोई तारीख सचमुच 'मनहूस' हो सकती है? हालांकि विज्ञान और तर्कवादी इस बात को सिरे से खारिज करते हैं कि किसी अंक या तारीख में कोई जादुई या बुरी शक्ति होती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ब्रह्मांड और पृथ्वी पर होने वाली भौगोलिक घटनाएं जैसे भूकंप, टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल या चक्रवात किसी कैलेंडर की तारीख देखकर नहीं आते, बल्कि यह विशुद्ध रूप से प्राकृतिक प्रक्रियाएं हैं। इसी तरह मानवीय घटनाएं और हादसे भी संयोग का हिस्सा होते हैं। लेकिन इसके बावजूद, मानव मनोविज्ञान ऐसा है कि वह इन लगातार हो रहे इत्तेफाकों को जोड़कर देखता है और एक पैटर्न तलाशने की कोशिश करता है। कारण चाहे जो भी हो, लेकिन 26 तारीख का यह खौफनाक इतिहास इस बात की याद दिलाता है कि जीवन कितना अनिश्चित है और हमें हर पल के लिए सतर्क रहना चाहिए।