ग्रैंड मुफ्ती के विवादित बयान पर भड़के मुस्लिम बुद्धिजीवी, पढ़ाया इस्लाम का असली पाठ
नई दिल्ली। देश-दुनिया की धार्मिक और सामाजिक बहसों के बीच एक बार फिर महिलाओं के अधिकारों और उनकी जीवनशैली को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। हाल ही में एक प्रमुख इस्लामिक धर्मगुरु और ग्रैंड मुफ्ती की ओर से दिए गए उस बयान ने तहलका मचा दिया है जिसमें उन्होंने कहा था कि औरतों को घर की चारदीवारी के भीतर रहना चाहिए और यदि वे तीन बच्चों को जन्म देती हैं, तो उनकी जन्नत पक्की है। इस बयान के सामने आते ही सोशल मीडिया से लेकर वैचारिक मंचों तक तीखी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गई हैं। हैरानी की बात यह है कि इस बयान पर सबसे तीखा विरोध बाहर से नहीं, बल्कि खुद मुस्लिम समुदाय के भीतर से ही देखने को मिल रहा है। तमाम प्रगतिशील विचारकों, महिला कार्यकर्ताओं और मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने ग्रैंड मुफ्ती के इस बयान को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें इस्लाम के मूल सिद्धांतों और महिलाओं के असली अधिकारों का पाठ पढ़ाना शुरू कर दिया है।
क्या था ग्रैंड मुफ्ती का बयान और क्यों गरमाई सियासत?
धार्मिक हलकों से सामने आए इस बयान में महिलाओं की भूमिका को पारंपरिक और रूढ़िवादी सांचे में ढालने की कोशिश की गई थी। ग्रैंड मुफ्ती द्वारा यह तर्क दिया गया था कि महिलाओं का मुख्य दायित्व घर संभालना और परिवार की देखरेख करना है, और यदि वे रूढ़िवादी व्यवस्था के तहत जीवन बिताते हुए तीन बच्चों को जन्म देती हैं, तो धार्मिक दृष्टिकोण से उन्हें जन्नत नसीब होगी। इस तरह के बयानों को रूढ़िवादी सोच का प्रतीक माना जा रहा है। आधुनिक दौर में जहां एक ओर बेटियां शिक्षा, विज्ञान, राजनीति और खेल समेत हर क्षेत्र में देश और दुनिया का नाम रोशन कर रही हैं, वहीं इस तरह के बयान महिलाओं को वापस पुरानी सदियों में धकेलने की कोशिश के तौर पर देखे जा रहे हैं। यही कारण है कि इस बयान के सार्वजनिक होते ही समाज के विभिन्न वर्गों से तीखी आलोचनाएं आनी शुरू हो गईं।
मुस्लिम समुदाय के भीतर से ही उठी मुखर आवाजें: इस्लाम में महिलाओं का वास्तविक स्थान
ग्रैंड मुफ्ती के इस बयान के बाद मुस्लिम समाज के भीतर से ही सुधारवादी और प्रबुद्ध वर्ग खुलकर सामने आ गया है। शिक्षाविदों और इस्लामिक इतिहास के जानकारों का कहना है कि इस्लाम धर्म कभी भी महिलाओं को केवल घर की चारदीवारी में कैद रहने की सीख नहीं देता है। शुरुआती इस्लामिक इतिहास का हवाला देते हुए बुद्धिजीवियों ने याद दिलाया कि पैगंबर मोहम्मद के समय में महिलाओं ने व्यापार में हिस्सा लिया, युद्ध के मैदानों में घायलों की सेवा की और ज्ञान के प्रसार में बढ़-चढ़कर योगदान दिया। खुद पैगंबर की पत्नी हजरत खतीजा एक बेहद सफल और प्रसिद्ध व्यापारी थीं। ऐसे में यह कहना कि औरतों का काम सिर्फ घर में रहना है, इस्लाम के मूल और उदारवादी स्वरूप के पूरी तरह खिलाफ है। आलोचकों का साफ तौर पर कहना है कि धर्म के नाम पर महिलाओं की स्वतंत्रता और उनके करियर पर पाबंदी लगाने वाले ऐसे बयान केवल पुरुषवादी मानसिकता को बढ़ावा देते हैं।
आधुनिक शिक्षा, अधिकार और स्वतंत्रता बनाम पुरानी सोच का टकराव
आज का दौर डिजिटल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का है, जहां हर व्यक्ति अपनी काबिलियत के दम पर आगे बढ़ रहा है। ऐसे में महिलाओं को केवल बच्चा पैदा करने वाली मशीन या घर की चारदीवारी तक सीमित रखने वाली सोच पर गंभीर सवाल खड़े होने लाजिमी हैं। समाजशास्त्रियों का मानना है कि इस तरह के बयानों से युवा पीढ़ी में भ्रम की स्थिति पैदा होती है, खासकर उन मुस्लिम युवतियों के बीच जो उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने सपनों को उड़ान दे रही हैं। समुदाय के भीतर से उठ रहे इन विरोध के स्वरों को एक सकारात्मक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। यह इस बात का प्रमाण है कि अब लोग धर्म के नाम पर थोपे जाने वाले हर पुराने और संकीर्ण विचार को आंख मूंदकर स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं, बल्कि वे तार्किकता और बराबरी के साथ अपने अधिकारों की बात कर रहे हैं।
निष्कर्ष: बदलाव की बयार और भविष्य की दिशा
कुल मिलाकर, ग्रैंड मुफ्ती के इस बयान ने एक बार फिर रूढ़िवाद और आधुनिकता के बीच चल रही वैचारिक जंग को सतह पर ला दिया है। जिस प्रकार से मुस्लिम समुदाय के भीतर से ही इस बयान की आलोचना हुई है, वह यह साबित करता है कि समाज अब तार्किक और बराबरी के हक वाले नजरिए को अपना रहा है। धर्म के नाम पर महिलाओं के अधिकारों को सीमित करने की पुरानी दास्तानों को अब शिक्षित और जागरूक समाज कड़ी चुनौती दे रहा है। यह घटना इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में समाज सुधार और महिलाओं की स्वतंत्रता के सवाल पर बहस और अधिक तेज होने वाली है।