बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग और स्क्रिप्टेड वीडियो पर NHRC की सख्त नजर

बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग और स्क्रिप्टेड वीडियो पर NHRC की सख्त नजर

आधुनिक डिजिटल युग और सोशल मीडिया के इस दौर में हर कोई रातों-रात इंटरनेट सेंसेशन बनने की होड़ में लगा हुआ है। इस चकाचौंध भरी दुनिया में लाइक्स, व्यूज और फॉलोअर्स पाने के लिए लोग किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। लेकिन इन सबके बीच जो सबसे चिंताजनक और गंभीर पहलू उभरकर सामने आया है, वह है कम उम्र के मासूम बच्चों को इस अंधी दौड़ में झोंक देना। कई कंटेंट क्रिएटर्स और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स व्यूज बटोरने के लिए बच्चों से जबरन स्क्रिप्टेड, संवेदनशील और कई बार मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाले वीडियो शूट करवाते हैं। इस बेहद गंभीर और बच्चों के अधिकारों का हनन करने वाले मामले का संज्ञान लेते हुए देश के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने अब बेहद कड़ा रुख अपना लिया है। आयोग ने इस पूरी प्रवृत्ति को बाल अधिकारों का खुला उल्लंघन मानते हुए सोशल मीडिया की दिग्गज कंपनी 'मेटा' (Meta)—जो फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसी बड़ी ऐप्स का संचालन करती है—को एक सख्त नोटिस थमाया है और कई तीखे सवाल पूछे हैं।

मेटा को नोटिस: आखिर कैसे प्लेटफॉर्म पर अपलोड होते रहे ऐसे वीडियो?

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा मेटा को भेजे गए नोटिस में मुख्य रूप से यह सवाल उठाया गया है कि जब प्लेटफॉर्म्स पर चाइल्ड सेफ्टी और कम्युनिटी गाइडलाइंस को लेकर तमाम नीतियां होने का दावा किया जाता है, तब इस तरह के स्क्रिप्टेड और बाल शोषण को बढ़ावा देने वाले वीडियो धड़ल्ले से कैसे अपलोड और शेयर होते रहे? आयोग का यह तर्क है कि मेटा जैसी वैश्विक टेक कंपनियों के पास अत्याधुनिक एल्गोरिदम और मॉडरेशन टूल्स होते हैं, जो आपत्तिजनक कंटेंट को आसानी से डिटेक्ट कर सकते हैं। इसके बावजूद यदि इस प्रकार की सामग्री हजारों-लाखों दर्शकों तक पहुँचती रही और उस पर से मुद्रीकरण (Monetization) के जरिए कमाई होती रही, तो यह कंपनी की निगरानी प्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाती है। एनएचआरसी ने मेटा से यह स्पष्टीकरण मांगा है कि बाल अधिकारों की सुरक्षा और उनके शोषण को रोकने के लिए उनकी कंपनी द्वारा जमीनी स्तर पर और तकनीकी रूप से क्या कड़े कदम उठाए जा रहे हैं।

बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और बाल अधिकारों पर मंडराता गंभीर खतरा

कम उम्र के बच्चों को कैमरे के सामने स्क्रिप्ट रटाकर रोने, डरने, आपत्तिजनक हरकतें करने या समाज में गलत संदेश देने वाले दृश्यों में अभिनय कराने से उनके कोमल मन पर बहुत गहरा और नकारात्मक मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है। बच्चे अभी उस उम्र में नहीं होते कि वे वर्चुअल दुनिया के दुष्प्रभावों और लाइक्स-व्यूज के दबाव को समझ सकें। कई बार माता-पिता या लालची कंटेंट क्रिएटर अपनी पब्लिसिटी और पैसों के चक्कर में बच्चों के बचपन और उनकी निजता का सौदा कर देते हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों का यह लंबे समय से कहना रहा है कि सोशल मीडिया पर बाल कलाकारों या बच्चों के वीडियो बनाने के नियमों को बेहद सख्त किया जाना चाहिए। एनएचआरसी का यह ताजा कदम इस बात का प्रमाण है कि देश की सर्वोच्च संस्थाएं अब बच्चों के डिजिटल शोषण को और अधिक बर्दाश्त करने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं और इसके लिए सीधे तौर पर प्लेटफॉर्म प्रदाताओं को भी जवाबदेह बनाया जा रहा है।

भविष्य की डिजिटल नीतियां और माता-पिता के लिए एक बड़ी चेतावनी

यह पूरा मामला सिर्फ मेटा या किसी एक सोशल मीडिया कंपनी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे समाज और पैरेंटिंग के तौर-तरीकों पर भी एक गंभीर सवाल खड़ा करता है। इंटरनेट और सोशल मीडिया की इस अंधी दुनिया में माता-पिता को यह समझना होगा कि उनके बच्चों का बचपन और उनकी सुरक्षा किसी भी वायरल वीडियो या पैसे से कहीं ज्यादा कीमती है। आने वाले दिनों में एनएचआरसी के इस नोटिस के बाद उम्मीद की जा रही है कि मेटा और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स बच्चों से जुड़े कंटेंट को लेकर अपनी नीतियों को और अधिक कठोर बनाएंगे तथा आपत्तिजनक वीडियो पर तुरंत रोक लगाएंगे। यदि समय रहते इस दिशा में कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो बच्चों का यह डिजिटल शोषण आने वाली पीढ़ी के मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक बहुत बड़ा अभिशाप बन सकता है।