1 रुपये का पुराना नोट बना बर्बादी की वजह! 45 लाख के लालच में गंवाए लाखों, पुलिस भी हैरान

1 रुपये का पुराना नोट बना बर्बादी की वजह! 45 लाख के लालच में गंवाए लाखों, पुलिस भी हैरान

हैदराबाद में पुराने दुर्लभ नोटों की ऑनलाइन बिक्री के नाम पर ठगी का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। यहां एक स्थानीय निवासी को अज्ञात नंबर से कॉल कर उसके पास मौजूद 1 रुपये के पुराने नोट के बदले 45 लाख रुपये देने का झांसा दिया गया। भारी रकम के लालच में आकर पीड़ित ने उनके बताए प्रोसेस को फॉलो किया और अंततः रजिस्ट्रेशन व प्रोसेसिंग फीस के नाम पर अपने खाते से 7.93 लाख रुपये गंवा दिए।

पीड़ित की शिकायत के बाद जब हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर जांच शुरू की, तो इस एक मामले की कड़ियां देशभर के करीब 450 साइबर अपराधों से जुड़ती चली गईं। पुलिस के मुताबिक यह कोई अकेला ठग नहीं बल्कि एक संगठित अंतरराज्यीय सिंडिकेट है, जो 'म्यूल अकाउंट्स' (किराए के बैंक खाते) के जरिए अब तक 60 से 70 करोड़ रुपये का अवैध लेन-देन कर चुका है।

कार्रवाई के दौरान पुलिस ने नेटवर्क से जुड़े दो मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। इनके कब्जे से दर्जनों एक्टिव सिम कार्ड, पासबुक, चेकबुक और संवेदनशील बैंकिंग दस्तावेज बरामद किए गए हैं। पूछताछ में सामने आया कि ये सिम कार्ड और बैंक खाते हरियाणा से संचालित होने वाले बड़े साइबर फ्रॉड गिरोहों को मुहैया कराए जाते थे, जहां से पीड़ितों को कॉल कर फंसाया जाता था।

जांच में सामने आया कि गिरोह में शामिल कर्नाटक का रहने वाला एक आरोपी, जो परिवार के साथ हैदराबाद आकर कैब ड्राइविंग करता था, आर्थिक तंगी के चलते इस नेटवर्क का हिस्सा बना। वह कॉलेज छात्रों, डिलीवरी पार्टनर्स और कम आय वर्ग के स्थानीय लोगों को कमीशन का लालच देकर उनके नाम पर बैंक खाते खुलवाता और नए सिम कार्ड जारी करवाता था। इन खातों को 'म्यूल अकाउंट' बनाकर ठगी की रकम घुमाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था।

विशेषज्ञों और साइबर पुलिस के अनुसार, पुराने सिक्के या नोट ऑनलाइन लाखों-करोड़ों में बिकने का दावा पूरी तरह फर्जी होता है। किसी भी अनजान व्यक्ति के कहने पर प्रोसेसिंग चार्ज या टैक्स के नाम पर पैसे ट्रांसफर न करें। साथ ही, थोड़े से कमीशन के लालच में अपना बैंक खाता, एटीएम कार्ड, यूपीआई क्रेडेंशियल्स या सिम कार्ड किसी अन्य व्यक्ति को इस्तेमाल के लिए देना गैरकानूनी है, क्योंकि ऐसा करने पर खाताधारक भी संगठित अपराध में सह-अभियुक्त बन सकता है।