पैलेट गन पर 'सियासी फायरिंग': राहुल गांधी ने अमित शाह को घेरा, तो बीजेपी ने इतिहास खंगालकर तुरंत किया पलटवार
देश की संसद में एक बार फिर सुरक्षा बलों और आंतरिक सुरक्षा के मुद्दों को लेकर राजनीतिक पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। इस बार घमासान का मुख्य केंद्र कश्मीर और अन्य संवेदनशील इलाकों में इस्तेमाल होने वाली 'पैलेट गन' बनी है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस संवेदनशील मुद्दे को उठाते हुए सीधे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर गंभीर आरोप लगाए। राहुल गांधी ने सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि नागरिकों के खिलाफ इस तरह के सख्त बल प्रयोग से हालात सुधरने के बजाय और बिगड़ रहे हैं। हालांकि, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने भी इस पर तगड़ा स्टैंड लेते हुए तुरंत बेहद आक्रामक अंदाज में जवाब दिया है।
राहुल गांधी का तीखा हमला: 'अमित शाह की नीतियां जनता के खिलाफ'
संसद के भीतर सरकार को घेरते हुए राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि गृह मंत्रालय कश्मीर में शांति बहाली के नाम पर आम नागरिकों के अधिकारों का हनन कर रहा है। उन्होंने पैलेट गन के इस्तेमाल से युवाओं को होने वाले शारीरिक नुकसान और आंखों की रोशनी जाने के मामलों का जिक्र करते हुए गृह मंत्री अमित शाह को कटघरे में खड़ा किया। राहुल गांधी ने कहा कि कश्मीर में आज भी डर और खौफ का माहौल बनाकर शासन चलाया जा रहा है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने सरकार से पैलेट गन के इस्तेमाल पर तुरंत पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग दोहराई।
बीजेपी का करारा पलटवार: 'कांग्रेस शासनकाल में ही शुरू हुआ था पैलेट गन का इस्तेमाल'
राहुल गांधी के आरोपों पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी के वरिष्ठ प्रवक्ताओं ने बिना कोई समय गंवाए पलटवार किया। बीजेपी ने पुराना इतिहास खंगालते हुए कांग्रेस को याद दिलाया कि कश्मीर में सबसे पहले पैलेट गन का इस्तेमाल साल 2010 में यूपीए (UPA) सरकार के दौरान ही शुरू किया गया था। सत्ता पक्ष की ओर से बयान आया कि जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब कश्मीर में प्रदर्शनकारियों पर हजारों राउंड पैलेट गन चलाई गईं, जिसमें सैकड़ों युवाओं की आंखों की रोशनी गई थी। बीजेपी ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी संसद में घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं और इस संवेदनशील राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर केवल राजनीति कर रहे हैं।
नेशनल सिक्योरिटी बनाम ह्यूमन राइट्स: फिर छिड़ी बड़ी बहस
पैलेट गन को लेकर संसद से शुरू हुई यह 'सियासी फायरिंग' अब सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में एक बड़ी बहस का रूप ले चुकी है। एक तरफ जहां विपक्ष इसे मानवाधिकारों का हनन बताकर सरकार को घेर रहा है, वहीं दूसरी तरफ सत्ता पक्ष का कहना है कि सुरक्षा बलों की सुरक्षा और घाटी में पथराव व हिंसा जैसी कानून-व्यवस्था की स्थितियों को नियंत्रित करने के लिए गैर-घातक हथियारों (Non-Lethal Weapons) का इस्तेमाल जरूरी हो जाता है। बहरहाल, दोनों तरफ से हो रही इस बयानबाजी ने संसद के मौजूदा सत्र को पूरी तरह से गरमा दिया है।