'औरंगजेब नहीं, ब्राह्मण ने लगाया था ब्रेस्ट टैक्स', प्रशांत भूषण की SC में दलील, फिर जज ने पूछे तीखे सवाल
देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों कई ऐसे मामलों पर सुनवाई चल रही है जो इतिहास, सामाजिक ताने-बाने और धार्मिक मान्यताओं से जुड़े हुए हैं। इसी कड़ी में न्यायालय के समक्ष एक ऐसा ही बेहद संवेदनशील और वैचारिक बहस का मुद्दा उठा, जिसने courtroom में मौजूद सभी लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। देश के जाने-माने वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने एक मामले की सुनवाई के दौरान अपनी दलील रखते हुए इतिहास के एक पुराने और विवादास्पद प्रसंग का जिक्र किया। उन्होंने केरल के उस चर्चित ऐतिहासिक संदर्भ का हवाला दिया, जिसमें दलित और निचली जातियों की महिलाओं पर कर लगाए जाने की कुप्रथा का जिक्र किया जाता है। इस दलील के सामने आते ही अदालत कक्ष में कुछ पलों के लिए खामोशी छा गई और कानूनी गलियारों में इस पर चर्चा तेज हो गई।
औरंगजेब का इतिहास बनाम स्थानीय सामाजिक कुप्रथाएं: कोर्ट में वकीलों के बीच छिड़ी बहस
अपनी दलील को आगे बढ़ाते हुए वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि इतिहास के पन्नों में कई बार शासकों और राजाओं के नाम पर ऐसी कुप्रथाओं को जोड़ दिया जाता है, जिनकी वास्तविकता स्थानीय सामाजिक व्यवस्थाओं और प्रभुत्वशाली वर्गों से जुड़ी होती है। उन्होंने त्रावणकोर के दौर का हवाला देते हुए दावा किया कि तथाकथित ब्रेस्ट टैक्स (Breast Tax) जैसी अमानवीय प्रथा के पीछे मुगल शासक औरंगजेब का कोई लेना-देना नहीं था, बल्कि यह केरल के स्थानीय ब्राह्मणवादी वर्चस्व और सामंती सामाजिक व्यवस्था की देन थी। वकीलों के एक वर्ग का तर्क था कि इस तरह के ऐतिहासिक उदाहरणों को वर्तमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य में किस रूप में देखा जाना चाहिए, जबकि दूसरे पक्ष का मानना था कि इतिहास की घटनाओं को आज के दौर के चश्मे से देखकर समाज में वैमनस्य नहीं फैलाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के जजों ने उठाए तीखे सवाल: इतिहास के पन्नों को कुरेदने की क्या है प्रासंगिकता?
प्रशांत भूषण द्वारा रखी गई इस तीखी और विवादित दलील पर बेंच की अध्यक्षता कर रहे माननीय न्यायाधीशों ने तुरंत प्रतिक्रिया दी और कई कड़े व तीखे सवाल खड़े किए। जजों ने सवाल किया कि इस तरह के संवेदनशील ऐतिहासिक संदर्भों को अदालत की कार्यवाही या वर्तमान कानूनी मामलों के बीच लाना न्यायिक प्रक्रिया के लिहाज से कितना उचित है? अदालत ने टिप्पणी की कि सदियों पुराने इतिहास के किस पन्ने पर किसने क्या किया या कौन सी कुप्रथा किस वर्ग द्वारा चलाई गई थी, इसका वर्तमान अधिकारों और संवैधानिक मामलों के फैसले पर सीधा असर नहीं होना चाहिए। जजों ने वकीलों को हिदायत दी कि अदालत का समय केवल संविधान, कानून और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के दायरे में रहकर बहस करने के लिए है, न कि ऐतिहासिक बहसों और पुराने जख्मों को कुरेदने का मंच बनाने के लिए।
सामाजिक सुधार और न्यायिक मंचों पर इतिहास की व्याख्या पर उठते बड़े सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर इस बात पर बहस छेड़ दी है कि क्या अदालतों को ऐतिहासिक बहसों में उलझना चाहिए। भारत का इतिहास विविधता, संघर्ष और सामाजिक सुधारों के लंबे दौर से गुजरा है, जहां राजा-महाराजाओं से लेकर समाज सुधारकों तक ने कुप्रथाओं के खिलाफ लंबी लड़ाइयां लड़ी हैं। हालांकि, कानूनी जानकारों का मानना है कि जब भी इस तरह के संवेदनशील और जातिगत इतिहास अदालतों की देहरी पर पहुंचते हैं, तो वे समाज के विभिन्न वर्गों में भावनाओं को भड़काने का काम करते हैं। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने साफ कर दिया है कि देश की न्यायपालिका का मुख्य उद्देश्य इतिहास के पन्नों की पड़ताल करना नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के नागरिकों को संविधान के तहत त्वरित और निष्पक्ष न्याय दिलाना है।