Jhunjhunu News: भंडारे में 5000 लोगों ने खाया प्रसाद, फिर भी नहीं दिखा प्लास्टिक कचरा, जानिए क्या है खास व्यवस्था
राजस्थान के शेखावाटी अंचल के झुंझुनूं जिले में हाल ही में आयोजित एक भव्य और विशाल धार्मिक अनुष्ठान के दौरान एक ऐसा अनूठा उदाहरण देखने को मिला, जिसने पूरे देश के आयोजकों और पर्यावरणविदों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। आमतौर पर जब भी देश में किसी बड़े भंडारे या सार्वजनिक भोज का आयोजन होता है, तो वहां हजारों की संख्या में जुटाई गई भीड़ के बाद डिस्पोजेबल प्लास्टिक की प्लेटें, गिलास और कैरी बैग्स का अंबार लग जाता है। लेकिन झुंझुनूं में आयोजित इस धार्मिक भंडारे में नजारा बिल्कुल उलट था। यहाँ एक-दो नहीं बल्कि पूरे 5000 से अधिक श्रद्धालुओं ने एक साथ बैठकर महाप्रसाद ग्रहण किया, लेकिन आयोजन स्थल पर एक सिंगल-यूज प्लास्टिक का टुकड़ा या कचरा दूर-दूर तक देखने को नहीं मिला। इस अनुशासित और पर्यावरण-अनुकूल आयोजन की चर्चा अब पूरे जिले ही नहीं बल्कि पूरे राज्य में जोरों पर हो रही है।
पर्यावरण संरक्षण की अनूठी पहल: पत्तलों और धोने से लेकर स्टील के बर्तनों तक का हुआ इस्तेमाल
झुंझुनूं के इस भंडारे की सफलता के पीछे आयोजकों की वह दूरदर्शिता और पक्की सोच थी, जिसके तहत उन्होंने आधुनिक प्लास्टिक और थर्मोकोल के बर्तनों का पूरी तरह से बहिष्कार करने का कड़ा संकल्प लिया था। भोजन परोसने के लिए पूरी तरह से पारंपरिक और बायोडिग्रेडेबल (Biodegradable) माध्यमों का सहारा लिया गया। श्रद्धालुओं को भोजन पारंपरिक पत्तलों और मिट्टी के सकोरों तथा दोने में परोसा गया, जो कुछ ही दिनों में पर्यावरण में अपने आप घुल-मिल जाते हैं। इसके अलावा, जिन जगहों पर बड़े पैमाने पर पानी और प्रसाद वितरण की व्यवस्था थी, वहां पूरी तरह से स्टील के गिलासों और बर्तनों का उपयोग किया गया, जिन्हें धोने के बाद बार-बार इस्तेमाल किया जा सके। इस छोटी सी पहल ने आयोजन स्थल को पूरी तरह से कचरा मुक्त बनाए रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई।
स्थानीय युवाओं और स्वयंसेवकों की मुस्तैदी: शून्य कचरा नीति (Zero Waste Policy) का रखा गया पूरा ध्यान
इस आयोजन को ऐतिहासिक बनाने में स्थानीय युवाओं, महिलाओं और समर्पित स्वयंसेवकों (Volunteers) की टोली ने दिन-रात एक कर दिया। आयोजन समिति ने पहले से ही 'जीरो वेस्ट पॉलिसी' (Zero Waste Policy) का बोर्ड लगा रखा था और हर आने वाले श्रद्धालु को स्वच्छता के प्रति जागरूक किया जा रहा था। भंडारे के दौरान जैसे ही कोई पत्तल या पत्ता इस्तेमाल होता, तुरंत स्वयंसेवक उसे उठाकर निर्धारित जैविक खाद वाले गड्ढे में डाल देते थे, जिससे इधर-उधर गंदगी फैलने का कोई सवाल ही पैदा नहीं हुआ। स्थानीय लोगों ने बताया कि इस प्रकार के आयोजनों से न केवल धार्मिक परंपराओं का निर्वहन होता है, बल्कि आने वाली पीढ़ी को भी प्रकृति और पर्यावरण से प्यार करने की एक बड़ी सीख मिलती है।
पूरे देश के लिए प्रेरणा बना झुंझुनूं का यह मॉडल: क्या अन्य धार्मिक आयोजनों को भी अपनाना चाहिए यह तरीका?
झुंझुनूं के इस प्रेरणादायक भंडारे की गूंज अब सोशल मीडिया और स्थानीय प्रशासनिक बैठकों में भी सुनाई दे रही है। पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर देश के हर बड़े मेले, भंडारे और सामाजिक समारोह में झुंझुनूं जैसी व्यवस्था लागू कर दी जाए, तो हमारे शहर और नदियां प्लास्टिक के जहर से पूरी तरह सुरक्षित हो सकते हैं। आज के समय में जहां सिंगल-यूज प्लास्टिक हमारे पर्यावरण, मिट्टी और भूजल को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है, वहां झुंझुनूं के इन जागरूक नागरिकों ने यह साबित कर दिया है कि थोड़ी सी इच्छाशक्ति और प्रशासनिक सहयोग से बड़े आयोजनों को भी पूरी तरह इको-फ्रेंडली (Eco-friendly) बनाया जा सकता है। यह अनूठी पहल देश भर के आयोजकों के लिए एक बेहतरीन और अनुकरणीय मॉडल बन चुकी है।