दिल्ली में प्रदर्शन पर SC सख्त: मेट्रो-इंटरनेट बंद करने पर उठाए सवाल, गृह सचिव और पुलिस कमिश्नर को नोटिस
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में होने वाले आयोजनों, राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों के दौरान आम जनजीवन को ठप करने वाली पाबंदियों को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद सख्त और कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। हाल के दिनों में विभिन्न प्रदर्शनों के मद्देनजर अचानक से मेट्रो स्टेशनों के शटर गिराए जाने, मुख्य मार्गों को बैरिकेड्स लगाकर सील करने और इंटरनेट सेवाओं को निलंबित करने जैसी प्रशासनिक कार्रवाइयों पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी नाराजगी जताई है। अदालत ने इस बात पर गंभीर सवाल उठाए हैं कि क्या लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध के नाम पर या कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आड़ में आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करना और पूरे शहर को एक तरह से कैदखाने में बदल देना उचित है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के गृह सचिव और दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को औपचारिक नोटिस जारी कर स्पष्ट जवाब तलब किया है, जिससे प्रशासनिक गलियारों में भारी हलचल मच गई है।
आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी और मौलिक अधिकारों पर भारी पड़ती पाबंदियां
जब भी राजधानी दिल्ली में कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन या राजनीतिक मार्च निकलता है, तो एहतियात के तौर पर प्रशासन द्वारा उठाए जाने वाले कदमों का सबसे बड़ा खामियाजा आम जनता, छात्रों, मरीजों और दैनिक वेतन भोगी कामगारों को भुगतना पड़ता है। अचानक से मेट्रो के कई प्रमुख गेट बंद कर दिए जाने से लाखों यात्री घंटों स्टेशनों पर फंसे रहते हैं और अपने दफ्तरों या गंतव्य तक समय पर नहीं पहुँच पाते। इसके साथ ही इंटरनेट सेवाओं को अचानक बंद कर दिए जाने से डिजिटल बैंकिंग, ऑनलाइन व्यापार, कैब सेवाएं और छात्रों की पढ़ाई-लिखाई बुरी तरह प्रभावित होती है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इसी बुनियादी मुद्दे पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून और व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी जरूर है, लेकिन इसके लिए पूरे शहर के पहिये रोक देना और नागरिकों की आवाजाही की स्वतंत्रता को अनिश्चितकाल के लिए प्रतिबंधित कर देना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता है।
गृह सचिव और दिल्ली पुलिस कमिश्नर को नोटिस, मांगा गया विस्तृत जवाब
सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ द्वारा इस मामले में कड़ा संज्ञान लेते हुए केंद्रीय गृह सचिव और दिल्ली पुलिस आयुक्त को नोटिस जारी किए जाने के बाद अब प्रशासन की कार्यप्रणाली पर न्यायिक निगरानी और अधिक कड़ी हो गई है। अदालत ने पूछा है कि आखिर किस मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) या दिशा-निर्देशों के तहत बिना किसी पूर्व सूचना के मेट्रो सेवाएं रोकी जाती हैं और इंटरनेट ब्लॉक किया जाता है। न्यायालय ने यह भी जानना चाहा है कि क्या विरोध प्रदर्शनों से निपटने के लिए पुलिस के पास कोई ऐसा वैज्ञानिक और संतुलित तरीका नहीं है जिससे यातायात को सुचारू रखते हुए कानून व्यवस्था को संभाला जा सके। प्रशासन को इस मामले में अपना विस्तृत हलफनामा दाखिल करना होगा जिसमें यह बताना होगा कि भविष्य में नागरिकों को असुविधा से बचाने के लिए क्या वैकल्पिक उपाय अपनाए जाएंगे। इस न्यायिक कदम से साफ हो गया है कि अब प्रशासनिक निर्णयों की समीक्षा का दायरा और अधिक व्यापक हो चुका है।
उत्तर प्रदेश और एनसीआर के यात्रियों पर भी पड़ता है इन पाबंदियों का सीधा असर
दिल्ली में लगने वाली इन पाबंदियों और सुरक्षा व्यवस्था के कड़े पहरे का सीधा और व्यापक असर पड़ोसी राज्यों विशेषकर उत्तर प्रदेश के उन लाखों यात्रियों पर भी पड़ता है जो रोजाना दिल्ली आना-जाना करते हैं। नोएडा, गाजियाबाद, मेरठ, हापुड़ और बुलंदशहर से हर रोज नौकरी, व्यापार और पढ़ाई के सिलसिले में राजधानी आने वाले लोगों को अचानक मेट्रो और सड़क मार्ग बंद होने के कारण भारी मानसिक और शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उत्तर प्रदेश के यात्रियों के लिए दिल्ली की सीमा पर लगने वाले लंबे जाम और ट्रैफिक डायवर्जन एक बड़ी चुनौती बन जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी और नोटिस के बाद उत्तर प्रदेश और एनसीआर के दैनिक यात्रियों में भी एक उम्मीद जगी है कि शायद अब प्रशासन भविष्य में इस तरह की अंधाधुंध पाबंदियों से बचेगा और आवागमन को सुगम बनाए रखने के लिए अधिक व्यावहारिक कदम उठाएगा।
विरोध प्रदर्शन और लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की जरूरत
विधि विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह पहल भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है, जो एक तरफ नागरिकों के विरोध प्रदर्शन करने के लोकतांत्रिक अधिकार और दूसरी तरफ आम जनता की सामान्य जिंदगी जीने की स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करेगी। एक मजबूत लोकतंत्र में सरकार और नागरिकों के बीच संवाद का रास्ता कभी भी बंद नहीं होना चाहिए और न ही सुरक्षा के नाम पर पूरे प्रशासनिक तंत्र को इस तरह से पंगु बनाया जाना चाहिए कि आम आदमी का जीवन अस्त-व्यस्त हो जाए। आने वाले दिनों में जब गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस की तरफ से इस नोटिस का जवाब अदालत में पेश किया जाएगा, तब इस पर देश भर की निगाहें टिकी होंगी कि प्रशासन अपनी नीतियों में क्या बदलाव करने जा रहा है। कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह रुख यह संदेश देता है कि राज्य की मनमानी पर संविधान का कड़ा पहरा हमेशा बना रहेगा।