जंतर-मंतर पर प्रदर्शन रोकना पुलिस को पड़ा भारी! हाईकोर्ट ने लगाई फटकार

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन रोकना पुलिस को पड़ा भारी! हाईकोर्ट ने लगाई फटकार

देश की राजधानी में लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन के अधिकारों को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बेहद सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने 'आरक्षण के विरुद्ध प्रदर्शन' करने की अनुमति न देने के रवैये पर दिल्ली पुलिस को आड़े हाथों लिया।

क्षत्रिय करणी सेना की याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कड़ा ऐतराज जताते हुए सवाल किया कि केवल भीड़ बढ़ने की आशंका के आधार पर किसी भी प्रदर्शन पर 'ब्लैंकेट बैन' (पूर्ण प्रतिबंध) कैसे लगाया जा सकता है।

सोशल मीडिया अकाउंट्स और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर दो याचिकाएं

करणी सेना की ओर से पैरवी कर रहे वकील रोशन धनाई ने अदालत को अवगत कराया कि उनकी ओर से दो अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की गई हैं। पहली याचिका मेटा प्लेटफॉर्म्स—फेसबुक, इंस्टाग्राम और वॉट्सऐप अकाउंट्स के निलंबन से जुड़ी है। उन्होंने बताया कि इंस्टाग्राम अकाउंट तो बाद में बहाल कर दिया गया, लेकिन फेसबुक लाइव वीडियो फीचर और मुख्य वॉट्सऐप नंबर अब भी सस्पेंड हैं। वहीं दूसरी याचिका जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की अनुमति खारिज किए जाने के खिलाफ है। इससे पहले अदालत ने दिल्ली पुलिस को उनके आवेदन पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने के निर्देश दिए थे।

एसीपी ने पहले दिया भरोसा, फिर लेटर भेजकर अनुमति से किया इनकार

अधिवक्ता रोशन धनाई ने अदालत में दलील दी कि संबंधित एसीपी ने पहले उन्हें बुलाकर आश्वासन दिया था कि प्रदर्शन की अनुमति दे दी जाएगी। इसके बाद 15 तारीख को अचानक एक पत्र जारी कर अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया गया। पुलिस ने अपने इनकार पत्र में तर्क दिया कि आयोजकों द्वारा किए गए दावे से कहीं अधिक भीड़ जुटने की आशंका है, जिसे मौके पर नियंत्रित करना कानून-व्यवस्था के लिहाज से मुश्किल हो सकता है।

'शर्तें लगाकर अनुमति देते, सीधे मना कैसे कर सकते हैं?': जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा

पुलिस के इस रुख पर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने तीखी नाराजगी जताई। उन्होंने पुलिस से सवाल किया कि आवेदन को खारिज क्यों किया गया, क्या केवल इस आशंका के आधार पर ऐसा नकारात्मक आदेश जारी किया जा सकता है कि कुछ लोग ज्यादा आ जाएंगे। जज ने साफ कहा कि पिछली सुनवाई पर भी स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि पुलिस अपनी ओर से जरूरी नियम, शर्तें और बंदिशें तय कर सकती है और कुछ घंटों के लिए सशर्त अनुमति दी जा सकती है। उन्होंने सवाल दागा कि उचित शर्तों के साथ अनुमति देने के बजाय सीधे तौर पर इनकार कैसे किया जा सकता है।

दिल्ली पुलिस की दलील: सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस और सेंट्रल दिल्ली की संवेदनशीलता

दिल्ली पुलिस की तरफ से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने फैसले का बचाव किया। उन्होंने कहा कि पुलिस सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुरूप ही काम कर रही है। जंतर-मंतर एक अति-संवेदनशील क्षेत्र है और वहां जगह की कमी के चलते अन्य संगठनों को भी लगातार अनुमतियां नहीं दी जा रही हैं। एएसजी ने आयोजकों के सोशल मीडिया पोस्ट्स पर मिले लाइक्स और व्यूज का हवाला देते हुए आशंका जताई कि भीड़ जंतर-मंतर की तय क्षमता से काफी अधिक हो सकती है।

'सोशल मीडिया व्यूज का मतलब असल भीड़ नहीं': याचिकाकर्ता की दलील

पुलिस के इस तर्क का जवाब देते हुए वकील धनाई ने कहा कि सोशल मीडिया पर वीडियो देखने वाले केवल दिल्ली के नहीं, बल्कि देश और दुनिया भर के लोग हैं। जितने ऑनलाइन व्यूज हैं, वे सभी लोग उठकर जंतर-मंतर नहीं पहुंच जाएंगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि जंतर-मंतर दशकों से धरना-प्रदर्शनों का ऐतिहासिक केंद्र रहा है, जहां दिल्ली पुलिस का नियंत्रण तंत्र बेहद मजबूत है।

स्थान बदलकर अनुमति देने पर विचार, 22 सितंबर को होगी अगली सुनवाई

सुनवाई के दौरान जस्टिस शर्मा ने पूछा कि क्या प्रदर्शन का स्थान बदलकर इसे किसी अन्य जगह आयोजित करने की अनुमति दी जा सकती है। इस पर एएसजी ने कहा कि वे इस बिंदु पर विचार करेंगे, हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि जंतर-मंतर पर भारी जमावड़े का सीधा असर पूरे लुटियंस और सेंट्रल दिल्ली के यातायात और सुरक्षा पर पड़ता है। अदालत ने दोहराया कि किसी भी कार्यक्रम पर पूरी तरह रोक लगाना उचित नहीं है और पुलिस से पूछा कि क्या कुछ पाबंदियों और वैकल्पिक स्थान के साथ परमिशन संभव है। इस पर एएसजी ने संबंधित अधिकारियों से नए निर्देश लेकर अदालत को अवगत कराने की बात कही, जिसके बाद मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर के लिए तय कर दी गई।