ठाकरे Vs शिंदे: शिवसेना के नाम और 'धनुष-बाण' पर महासंग्राम, सुप्रीम कोर्ट में उद्धव गुट की तरफ से रखी गईं ये तीखी दलीलें

ठाकरे Vs शिंदे: शिवसेना के नाम और 'धनुष-बाण' पर महासंग्राम, सुप्रीम कोर्ट में उद्धव गुट की तरफ से रखी गईं ये तीखी दलीलें

महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल लाने वाली शिवसेना की टूट का मामला आज भी सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में पूरी गरमी के साथ बहस का विषय बना हुआ है। शिवसेना के नाम और उसके ऐतिहासिक 'धनुष-बाण' चुनाव चिह्न पर असली अधिकार किसका है, इसे लेकर उद्धव ठाकरे गुट (शिवसेना-UBT) की तरफ से अदालत में एक के बाद एक बेहद मजबूत और धारदार कानूनी दलीलें पेश की जा रही हैं। पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खेमे ने इस कानूनी लड़ाई में बागी गुट और चुनाव आयोग दोनों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, जिससे यह मामला भारतीय राजनीति के इतिहास का सबसे बड़ा संवैधानिक केस बनता जा रहा है।

राजनीतिक दल बनाम विधायक दल: असली शिवसेना किसकी?

सुप्रीम कोर्ट में उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ वकीलों ने मुख्य रूप से यह कड़ा तर्क रखा है कि किसी भी राजनीतिक दल के नाम और उसके चुनाव चिह्न पर असली हक उस 'मूल राजनीतिक दल' का होता है जिसमें पार्टी के लाखों कार्यकर्ता, जमीनी पदाधिकारी, आम सदस्य और मतदाता शामिल होते हैं, न कि केवल मुट्ठीभर चुने हुए विधायकों या मंत्रियों का कोई 'विधायक दल'। अदालत में यह स्पष्ट रूप से कहा गया कि रातों-रात कुछ विधायकों के बागी हो जाने से पूरी पार्टी नहीं बदल जाती और विधायक दल कभी भी पूरे राजनीतिक संगठन का विकल्प नहीं हो सकता।

चुनाव आयोग की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल

उद्धव खेमे ने सर्वोच्च अदालत में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के उस बहुचर्चित फैसले को खुली चुनौती दी है जिसके तहत एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना घोषित करते हुए 'धनुष-बाण' चिह्न आवंटित कर दिया गया था। उद्धव गुट का पक्ष रख रहे वकीलों का कहना है कि चुनाव आयोग ने पार्टी के संगठनात्मक बहुमत (Organizational Majority) को पूरी तरह से नजरअंदाज किया। इसके साथ ही, यह भी तर्क दिया गया कि आयोग के पास पार्टी के आंतरिक संविधान—विशेष तौर पर 2018 के संशोधित संविधान—की वैधता पर फैसला सुनाने का कोई अधिकार नहीं था, जबकि आयोग का यह दावा करना गलत था कि उनके रिकॉर्ड में वह संविधान उपलब्ध नहीं था।

पार्टी संविधान और आंतरिक लोकतंत्र का उल्लंघन

कानूनी बहसों के दौरान इस बात पर भी विशेष जोर दिया गया कि शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे के निधन के बाद उद्धव ठाकरे को पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया और सर्वसम्मति से पार्टी का मुख्य प्रमुख (पक्ष प्रमुख) चुना गया था। पार्टी के संविधान के अनुसार ही सांगठनिक नियुक्तियां की गईं और इसकी आधिकारिक जानकारी समय-समय पर चुनाव आयोग को भी भेजी जाती रही। उद्धव गुट का आरोप है कि मौजूदा सत्ताधारी बागी गुट ने सुनियोजित षड्यंत्र के तहत पार्टी के संविधान और आंतरिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की धज्जियां उड़ाई हैं।

दलबदल कानून और दसवीं अनुसूची के दुरुपयोग का आरोप

उद्धव ठाकरे के वकीलों ने कोर्ट को बताया कि जून 2022 में महाराष्ट्र में जो राजनीतिक घटनाक्रम हुआ, वह सीधे तौर पर संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून का घोर दुरुपयोग था। पार्टी के चुनाव निशान और टिकट पर जीतकर आए कुछ विधायकों ने विपक्षी दलों के साथ मिलकर अपनी ही चुनी हुई सरकार को गिरा दिया और खुद को ही असली पार्टी घोषित करवा लिया। उद्धव कैंप ने इसे लोकतंत्र और संवैधानिक मर्यादाओं के साथ एक भयंकर मजाक करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट से न्याय की गुहार लगाई है, जिस पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं।

 

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