उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस की 'एकला चलो' नीति पर उठाए तीखे सवाल

उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस की 'एकला चलो' नीति पर उठाए तीखे सवाल

भारतीय राजनीति के सबसे बड़े विपक्षी खेमे यानी 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के भीतर अंदरूनी कलह और मतभेद एक बार फिर खुलकर सामने आ गए हैं, जिससे राजनीतिक गलियारों में भूचाल आ गया है। शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने गठबंधन की एक बंद कमरे की उच्च स्तरीय बैठक के दौरान कांग्रेस पार्टी की कार्यप्रणाली पर कड़े शब्दों में आपत्ति जताई है। उद्धव ठाकरे ने दो टूक शब्दों में कहा है कि गठबंधन के भीतर कांग्रेस पार्टी की 'एकला चलो' (अकेले चलने) की नीति अब क्षेत्रीय दलों के लिए स्वीकार्य नहीं है, और यदि समन्वय की इसी तरह की स्थिति बनी रही तो विपक्षी एकता को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। उनके इस तीखे बयान और नाराजगी के बाद से विपक्षी गठबंधन के भीतर आपसी खींचतान और सीटों के तालमेल को लेकर चल रहा शीतयुद्ध सतह पर आ गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनावों और राष्ट्रीय रणनीतियों से ठीक पहले इस तरह की दरारें आना विपक्षी एकता के भविष्य पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा रहा है, जिससे भाजपा विरोधी मोर्चे की ताकत कमजोर हो सकती है।

क्षेत्रीय दलों की उपेक्षा बर्दाश्त नहीं, उद्धव ठाकरे के इस आक्रामक रुख ने बढ़ाई राष्ट्रीय स्तर के विपक्षी नेताओं की मुश्किलें

उद्धव ठाकरे द्वारा उठाए गए इस गंभीर मुद्दे के बाद गठबंधन के अन्य क्षेत्रीय दलों के नेताओं के भीतर भी सुगबुगाहट तेज हो गई है, जो मानते हैं कि राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते कांग्रेस को छोटे और क्षेत्रीय दलों के साथ सम्मानजनक व बराबरी का बर्ताव करना चाहिए। बैठक के दौरान उद्धव ठाकरे ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि जब तक सभी घटक दल आपसी अहंकार और एकतरफा फैसलों को छोड़कर सामूहिक नेतृत्व और आम सहमति के सिद्धांत पर काम नहीं करेंगे, तब तक चुनावी मैदान में सत्ताधारी दल का मुकाबला करना बेहद मुश्किल साबित होगा। कांग्रेस की तरफ से कई मौकों पर राज्यों में स्थानीय कैडर और क्षेत्रीय क्षत्रपों को भरोसे में लिए बिना अकेले दम पर बड़े फैसले लेने की प्रवृत्ति ने पहले भी कई बार गठबंधन में तनाव पैदा किया है। इस ताजा घटनाक्रम के बाद कांग्रेस आलाकमान के सामने अपने सहयोगियों को एकजुट रखने और उनके गिले-शिकवे दूर करने की एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है, क्योंकि यदि समय रहते इन आंतरिक असंतोषों को शांत नहीं किया गया तो विपक्षी एकता का यह महत्वाकांक्षी रथ समय से पहले ही बिखर सकता है।

विपक्षी गठबंधन में सीट शेयरिंग और नेतृत्व के सवाल पर गहराया संकट, राजनीतिक गलियारों में मची खलबली

आगामी चुनावी राजनीतिक रणनीतियों के दृष्टिकोण से देखा जाए तो उद्धव ठाकरे का यह बयान केवल एक असंतोष की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह सीट बंटवारे (seat sharing) और राज्यों में नेतृत्व के अधिकारों को लेकर चल रही अंदरूनी जंग का खुला इजहार है। क्षेत्रीय दल अपने-अपने गढ़ में मजबूत स्थिति में होने के बावजूद यदि राष्ट्रीय स्तर पर सीट वितरण में दोयम दर्जे का व्यवहार महसूस करेंगे, तो उनके लिए गठबंधन के साथ चलना राजनीतिक रूप से घाटे का सौदा साबित हो सकता है। दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी भी अपने राष्ट्रीय जनाधार और पुनरुद्धार की कोशिशों के तहत कई राज्यों में अधिक सीटों पर दावा ठोक रही है, जिसके चलते दोनों पक्षों के बीच टकराव की स्थिति लगातार बन रही है। इस पूरी घटना ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि वैचारिक मतभेदों को भुलाकर एक मंच पर आए विपक्षी दलों के लिए आपसी महत्वाकांक्षाओं और जमीनी वास्तविकताओं के बीच संतुलन बिठाना कितना कठिन काम है, और आने वाले दिनों में यह अंतर्कलह किस प्रकार राष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों को प्रभावित करेगी, इस पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं।