शेख हसीना की वापसी से क्यों खौफ में हैं जिहादी ताकतें? बांग्लादेश में क्या बदल जाएगा
दक्षिण एशिया के हमारे पड़ोसी देश बांग्लादेश की राजनीति एक बार फिर अत्यंत संवेदनशील और बड़े ऐतिहासिक मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है। हाल ही में हुए सत्ता परिवर्तन और भारी उथल-पुथल के बाद पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना (Sheikh Hasina) भले ही अस्थाई रूप से देश छोड़कर भारत में शरण लिए हुए हैं, लेकिन बांग्लादेश के सियासी गलियारों और आवामी लीग (Awami League) के कार्यकर्ताओं के बीच उनकी वापसी की चर्चाएं अब और तेज हो गई हैं। जैसे ही ढाका से लेकर चटगांव तक शेख हसीना की वतन वापसी की सुगबुगाहट शुरू हुई है, वहां पनप रहीं जिहादी और कट्टरपंथी ताकतों के पेट में दर्द होने लगा है। जमात-ए-इस्लामी (Jamaat-e-Islami), हिफाजत-ए-इस्लाम और अनसारुल्लाह बांग्ला टीम जैसे उग्रवादी संगठनों में गहरा खौफ और बेचैनी साफ तौर पर देखी जा रही है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर शेख हसीना के नाम से ही ये जिहादी ताकतें इस कदर क्यों थर-थर कांप रही हैं? यदि शेख हसीना की बांग्लादेश में दोबारा वापसी होती है, तो वहां का राजनीतिक, सामाजिक और रणनीतिक माहौल किस तरह पूरी तरह से बदल जाएगा? आइए इस पूरी इनसाइड रिपोर्ट में समझते हैं।
शेख हसीना का कड़ा रुख और जिहादी संगठनों का खात्मा: आखिर क्यों कट्टरपंथियों के लिए काल बनी थीं हसीना?
बांग्लादेश के इतिहास को करीब से देखने वाले रणनीतिकारों का मानना है कि शेख हसीना अपने 15 से अधिक वर्षों के शासनकाल के दौरान देश में धार्मिक कट्टरपंथ और आतंकवाद के खिलाफ सबसे मजबूत चट्टान की तरह खड़ी रही थीं। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान 'जीरो टॉलरेंस' (Zero Tolerance Policy) की नीति अपनाते हुए देश भर में सक्रिय दर्जनों आतंकी मॉड्यूल्स को ध्वस्त कर दिया था। 1971 के मुक्ति संग्राम के समय बांग्लादेशी अवाम पर अत्याचार करने वाले युद्ध अपराधियों (War Criminals) और जमात-ए-इस्लामी के शीर्ष नेताओं को फांसी के फंदे तक पहुंचाने का ऐतिहासिक काम केवल शेख हसीना के साहस से ही संभव हो सका था। इसके अलावा, उन्होंने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय उग्रवादी गुटों (जैसे उल्फा) को अपनी सरजमीं से पूरी तरह उखाड़ फेंका था। यही कारण है कि जिहादी तत्वों को यह अच्छी तरह मालूम है कि यदि शेख हसीना फिर से सत्ता में लौटती हैं, तो उनके द्वारा हाल के दिनों में बनाए गए तमाम नेटवर्क और ठिकाने एक झटके में पूरी तरह तबाह कर दिए जाएंगे।
तख्तापलट के बाद बांग्लादेश में जिहादी ताकतों का उभार और अल्पसंख्यकों पर बर्बर अत्याचार
शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद अंतरिम सरकार के दौर में बांग्लादेश के भीतर कट्टरपंथी तत्वों को एक नया जीवनदान मिलता हुआ नजर आया। जमात-ए-इस्लामी जैसे प्रतिबंधित और उग्रवादी संगठनों पर लगे प्रतिबंधों को हटा दिया गया या शिथिल कर दिया गया, जिससे जेलों में बंद कई खूंखार आतंकी और जिहादी कमांडर रातों-रात बाहर आ गए। इसके बाद बांग्लादेश के विभिन्न जिलों—जैसे सिलहट, कमिल्ला, नोआखली और ढाका—में रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय, उनके मंदिरों, व्यवसायों और महिलाओं को निशाना बनाया गया। चारों तरफ कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) के इशारे पर देश को एक फिर से 'इस्लामिक स्टेट' की राह पर धकेलने की साजिशें रची जाने लगीं। इन जिहादियों को लगा था कि अब उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता, लेकिन शेख हसीना की वापसी की खबरों ने उनके इस गुमान को पूरी तरह तोड़कर रख दिया है।
शेख हसीना की वापसी से बांग्लादेश के आंतरिक और बाहरी माहौल में क्या-क्या बदल जाएगा?
यदि शेख हसीना अपनी पार्टी आवामी लीग को दोबारा एकजुट करके बांग्लादेश की जमीनी राजनीति में वापसी करती हैं, तो देश में बड़े पैमाने पर रणनीतिक और प्रशासनिक बदलाव देखने को मिलेंगे। सबसे पहला असर यह होगा कि अंतरिम सरकार के दौरान उभरे चरमपंथी संगठनों पर फिर से कानूनी और सैन्य शिकंजा कस जाएगा। पुलिस प्रशासन, थल सेना और खुफिया एजेंसियों के भीतर मौजूद कट्टरपंथी समर्थकों की पहचान कर उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा। इसके साथ ही, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों (हिंदुओं और बौद्धों) की सुरक्षा सुनिश्चित होगी और उनके धार्मिक स्थलों पर हमले करने वाले दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाएगी। आर्थिक मोर्चे पर भी, जो देश इस समय विदेशी मुद्रा संकट और व्यापारिक अनिश्चितता से जूझ रहा है, वहां वैश्विक निवेशकों का भरोसा एक बार फिर बहाल हो सकेगा।
भारत-बांग्लादेश संबंध और दक्षिण एशियाई क्षेत्र की सुरक्षा पर पड़ेगा सीधा सकारात्मक असर
शेख हसीना के शासनकाल के दौरान भारत और बांग्लादेश के रिश्ते अपने स्वर्णिम दौर में थे। दोनों देशों के बीच कनेक्टिविटी, व्यापार, ऊर्जा साझेदारी और सीमा सुरक्षा को लेकर ऐतिहासिक समझौते हुए थे। भारत के लिए एक सुरक्षित, स्थिर और धर्मनिरपेक्ष बांग्लादेश बेहद जरूरी है ताकि पूर्वोत्तर की सीमाएं पूरी तरह शांत रहें। शेख हसीना की अनुपस्थिति का फायदा उठाकर चीन और पाकिस्तान जैसे भारत-विरोधी देश बांग्लादेश को अपना नया अड्डा बनाने की कोशिश कर रहे थे। ऐसे में यदि शेख हसीना की वापसी होती है, तो यह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और पूरे दक्षिण एशिया की रणनीतिक स्थिरता के लिए एक मास्टरस्ट्रोक साबित होगा। कट्टरपंथी ताकतों को यह डर है कि भारत और शेख हसीना का यह मजबूत गठबंधन उनके तमाम नापाक मंसूबों पर पानी फेर देगा।
क्या बांग्लादेशी अवाम अब जिहादियों के बिछाए जाल से बाहर निकलकर हसीना के समर्थन में आ रही है?
शुरुआती राजनीतिक विरोध और छात्रों के उग्र प्रदर्शनों के शांत होने के बाद, अब बांग्लादेश की आम जनता को भी यह अहसास होने लगा है कि शेख हसीना के बिना देश में केवल अराजकता, महंगाई और आतंकवाद का बोलबाला हुआ है। कपड़ा उद्योग (Garment Industry), जो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, वह पूरी तरह से ठप होने के कगार पर पहुंच चुका है। आम नागरिक अब शांति, रोजगार और सुरक्षित माहौल की मांग कर रहे हैं, जो केवल एक अनुभवी और सख्त नेतृत्व ही दे सकता है। आवामी लीग के जमीनी कार्यकर्ता अब हर जिले में फिर से संगठित हो रहे हैं और शेख हसीना के निर्देशों का इंतजार कर रहे हैं। जिहादी ताकतों का सबसे बड़ा खौफ यही है कि यदि जनता की यह हताशा एक बार फिर शेख हसीना के जनसमर्थन में बदल गई, तो कट्टरपंथियों के पास भागने का कोई रास्ता नहीं बचेगा।