CEC चयन समिति से CJI बाहर क्यों? सुप्रीम कोर्ट का केंद्र से तीखा सवाल—'दिखावा करने की जरूरत क्या है?'
देश में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर केंद्र सरकार के खिलाफ बेहद सख्त और तीखा रुख अख्तियार किया है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार के उस नए कानून पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिसके तहत चुनाव आयुक्तों को चुनने वाली हाई-लेवल कमेटी से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए पूछा कि चुनाव आयुक्त जैसे अति-महत्वपूर्ण संवैधानिक पद की नियुक्ति प्रक्रिया में स्वतंत्रता और निष्पक्षता का प्रदर्शन आखिर क्यों नहीं दिखाई देता?
जब सरकार को ही फैसला लेना है, तो फिर कमेटी में विपक्ष का दिखावा क्यों?
न्यायपीठ (जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दिपंकर दत्ता) ने सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की नीयत और नई चयन प्रक्रिया के संतुलन पर कड़े सवाल दागे। कोर्ट ने कहा, "अगर अंतिम फैसला केवल सरकार को ही करना है, तो सिलेक्शन कमेटी में लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष (LoP) को रखकर स्वतंत्रता और निष्पक्षता का महज एक 'दिखावा' करने की क्या आवश्यकता है?" अदालत ने ध्यान दिलाया कि वर्तमान व्यवस्था में समिति का अनुपात 2:1 का हो चुका है—यानी प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री एक तरफ, और विपक्ष के नेता अकेले दूसरी तरफ। ऐसे में बहुमत हमेशा सरकार के पास ही रहेगा, जिससे चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजिमी है।
CBI डायरेक्टर की तर्ज पर चुनाव आयुक्तों का चयन क्यों नहीं?
सुप्रीम कोर्ट ने देश की अन्य प्रमुख जांच और प्रशासनिक एजेंसियों का हवाला देते हुए केंद्र से पूछा कि जब केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के निदेशक (Director) की नियुक्ति प्रक्रिया में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाता है, तो फिर चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए ऐसी स्वतंत्र व्यवस्था क्यों नहीं की जा सकती? कोर्ट ने जोर देकर कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका सीधा संबंध देश के लोकतंत्र, उसकी अखंडता और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव (Free and Fair Elections) प्रणाली को बनाए रखने से है।
क्या है 2023 का वह कानून, जिस पर मचा है असली घमासान?
यह पूरा विवाद दिसंबर 2023 में संसद से पारित किए गए 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्य अवधि) अधिनियम, 2023' से जुड़ा हुआ है। दरअसल, मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और CJI की तीन सदस्यीय समिति की सिफारिश पर की जाएगी। लेकिन केंद्र सरकार ने बाद में नया कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया और समिति में से CJI को हटाकर उनकी जगह एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल कर लिया।
केंद्र सरकार का तर्क और कोर्ट की आगामी रूपरेखा
याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कोर्ट से मांग की है कि केंद्र सरकार के इस कानून पर तुरंत रोक लगाई जाए और नियुक्ति में न्यायपालिका की भूमिका को दोबारा बहाल किया जाए। दूसरी ओर, इस मामले पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिछला फैसला संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक के 'कानूनी शून्य' (Legal Vacuum) को भरने के लिए था, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि नया कानून पूरी तरह समीक्षा से परे है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इस पर आगे की विस्तृत कानूनी बहस और केंद्र सरकार के औपचारिक जवाब को सूचीबद्ध किया है।