प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति के समर्थन में पहली बार खुलकर उतरे यशवंत सिन्हा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति के समर्थन में पहली बार खुलकर उतरे यशवंत सिन्हा

भारतीय राजनीतिक गलियारों, कूटनीतिक हलकों और वैचारिक बहसों के बीच अक्सर एक ऐसा कड़ा रुख देखने को मिलता है जहां विपक्ष के दिग्गज नेता सरकार की नीतियों की आलोचना करने का कोई मौका नहीं छोड़ते, लेकिन जब देश की सुरक्षा और संप्रभुता का सवाल आता है, तो कई बार ऐसे बड़े मोड़ भी आते हैं जो सबको हैरान कर देते हैं। इसी कड़ी में केंद्र की मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार की विदेश नीति और विशेष रूप से चीन के प्रति अपनाए गए कड़े रणनीतिक रुख के समर्थन में देश के जाने-माने वरिष्ठ राजनेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा (Yashant Sinha) पहली बार खुलकर सामने आए हैं, जिन्होंने अपने इस अप्रत्याशित रुख से राजनीतिक पंडितों को चकित कर दिया है। एक समय में केंद्र सरकार के मुखर आलोचक माने जाने वाले यशवंत सिन्हा ने हाल ही में दिए अपने एक साक्षात्कार में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) की नीतियों और वहां की वर्तमान आर्थिक तथा भू-राजनीतिक स्थिति पर एक बेहद तीखा और तथ्यात्मक कटाक्ष करते हुए यह बयान दिया है कि 'आज के समय में चीन का गिलास आधा भरा हुआ नहीं बल्कि आधा खाली है', जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि ड्रैगन अब पहले जितना ताकतवर या अजेय नहीं रहा जितना वह दुनिया को दिखाने की कोशिश करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत द्वारा वैश्विक मंचों पर चीन को आंख में आंख डालकर जवाब देने की नीति का समर्थन करते हुए यशवंत सिन्हा का यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत-चीन के बीच सीमा विवाद और आर्थिक प्रतिस्पर्धा अपने सबसे संवेदनशील दौर से गुजर रही है। इस विस्तृत, विश्लेषणात्मक और ग्राउंड-जीरो रिपोर्ट के माध्यम से हम आपको यशवंत सिन्हा के इस बड़े बयान, इसके कूटनीतिक निहितार्थों और प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति को मिल रहे इस नए राजनीतिक समर्थन के हर एक पहलू के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं।

यशवंत सिन्हा का यह अप्रत्याशित और कड़ा रुख: क्यों बदला पूर्व केंद्रीय मंत्री का नजरिया और क्या हैं इसके मायने

भारतीय कूटनीति और राजनीति के इतिहास में यशवंत सिन्हा एक ऐसा नाम है जिन्होंने देश के वित्त मंत्री और विदेश मंत्री जैसे बेहद महत्वपूर्ण पदों पर रहकर अपनी प्रशासनिक दक्षता का लोहा मनवाया है और वे लंबे समय तक देश की नीतियों पर अपनी बेबाक राय रखते आए हैं। पिछले कुछ वर्षों में वे केंद्र की मौजूदा भारतीय जनता पार्टी सरकार और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यप्रणाली के सबसे तीखे आलोचकों में गिने जाते रहे हैं, और उन्होंने कई मौकों पर सरकार की आर्थिक और विदेश नीतियों को आड़े हाथों लिया था। लेकिन हाल ही में जब उन्होंने देश की राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमावर्ती प्रबंधन और चीन के खिलाफ अपनाई गई रणनीतिक स्वायत्तता के मुद्दे पर खुलकर मोदी सरकार के कदमों की सराहना की, तो इससे राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छिड़ गई। विश्लेषकों का यह मानना है कि जब बात देश की संप्रभुता, चीन के साथ चल रहे सीमाई तनाव और वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते दबदबे की आती है, तो देश के तमाम बड़े और वरिष्ठ राजनेता दलीय राजनीति की सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सबसे पहले रखते हैं, और यशवंत सिन्हा का यह बयान इसी परिपक्व राजनीतिक सोच का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करता है।

शी जिनपिंग और चीन की वर्तमान स्थिति पर यशवंत सिन्हा की वह टिप्पणी: 'चीन का गिलास आधा खाली है'

अपने साक्षात्कार के दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की नीतियों और ड्रैगन की महात्वाकांक्षाओं पर खुलकर बात करते हुए यशवंत सिन्हा ने बहुत ही सटीक और प्रतीकात्मक भाषा का इस्तेमाल किया, जिसने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह कहा कि दुनिया भर में और खुद पश्चिमी मीडिया में अक्सर यह प्रचारित किया जाता है कि चीन एक ऐसी महाशक्ति बन चुका है जिसे रोकना असंभव है, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है क्योंकि आज के हालात में 'चीन का गिलास आधा भरा हुआ है', जिसका मतलब यह है कि उसकी आंतरिक अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है, जनसांख्यिकी संकट गहरा रहा है और उसकी विस्तारवादी नीतियों के कारण दुनिया भर के देश उसके खिलाफ एकजुट हो रहे हैं। शी जिनपिंग की आक्रामक कूटनीति के कारण आज चीन को अपने ही पड़ोस में और वैश्विक बाजारों में भारी अविश्वास का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उसकी वह चमक फीकी पड़ने लगी है जो उसने पिछले दो दशकों में बनाई थी। एक अनुभवी राजनेता के मुंह से चीन की इस कमजोरी का इस तरह से खुलकर विश्लेषण किया जाना यह साबित करता है कि भारत अब ड्रैगन के मनोवैज्ञानिक दबाव में आने के बजाय उसकी हर एक कमजोरी का कूटनीतिक लाभ उठाने में पूरी तरह से सक्षम हो चुका है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति और चीन के खिलाफ अपनाए गए कड़े रणनीतिक कदमों का असर

पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने वैश्विक कूटनीति में जिस आत्मविश्वास और दृढ़ता का परिचय दिया है, उसने दुनिया की महाशक्तियों को भी भारत के साथ नए सिरे से रणनीतिक समीकरण बनाने पर मजबूर कर दिया है। गलवान घाटी की घटना के बाद से भारत सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि व्यापार और कूटनीति के साथ-साथ देश की सीमाओं की सुरक्षा से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा, और सीमा पर सैनिकों की तैनाती तथा बुनियादी ढांचे के विकास में कोई कोताही नहीं बरती जाएगी। इसके साथ ही, आर्थिक मोर्चे पर चीनी एप्स पर प्रतिबंध लगाने, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के नियमों को सख्त करने और घरेलू स्तर पर 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को बढ़ावा देकर भारत ने चीन को यह कड़ा संदेश दे दिया है कि वह अपनी हर जरूरत के लिए अब ड्रैगन पर निर्भर नहीं है। यशवंत सिन्हा जैसे वरिष्ठ नेता द्वारा इस पूरी नीति का परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से समर्थन किया जाना यह बताता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और चीन के मुद्दे पर भारत का राजनीतिक विपक्ष भी इस बात को समझता है कि सरकार का यह कड़ा रुख देश के दीर्घकालिक हितों के लिए कितना आवश्यक है।

वैश्विक भू-राजनीति में भारत का बढ़ता कद और ड्रैगन के लिए बढ़ती हुई घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय चुनौतियाँ

आज के इस बदलते हुए वैश्विक परिदृश्य में भारत ग्लोबल साउथ की एक मजबूत आवाज बनकर उभरा है और अमेरिका, रूस, यूरोप तथा जापान जैसे तमाम देशों के साथ हमारे रणनीतिक संबंध उस ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं जहां चीन के लिए भारत को नजरअंदाज करना असंभव हो गया है। एक तरफ जहां शी जिनपिंग की तानाशाहीपूर्ण नीतियों और रियल एस्टेट सेक्टर के ढहने के कारण चीन की आर्थिक विकास दर अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है, वहीं दूसरी तरफ भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय निवेशक अब चीन से अपना कारोबार समेटकर भारत जैसे स्थिर और लोकतांत्रिक देशों का रुख कर रहे हैं, जिससे चीन की वह आर्थिक धमक धीरे-धीरे कमजोर हो रही है जिसके दम पर वह एशिया में अपनी दादागिरी चलाया करता था। यशवंत सिन्हा का यह बयान कि चीन की स्थिति उतनी मजबूत नहीं है जितनी दिखती है, बिल्कुल जमीनी हकीकत पर आधारित है और यह भारत के उन तमाम युवाओं और नीति-निर्माताओं का मनोबल बढ़ाने वाला है जो देश को एक महाशक्ति के रूप में देखना चाहते हैं।

इस राजनीतिक समर्थन के दूरगामी परिणाम और देश के भीतर राष्ट्रीय एकता का संदेश

राजनीतिक और कूटनीतिक जानकारों का यह मानना है कि जब देश के भीतर सत्ता पक्ष और विपक्ष के वरिष्ठ नेता राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति जैसे संवेदनशील मुद्दों पर एक सुर में बात करते हैं, तो उसका एक बहुत ही सकारात्मक संदेश पूरी दुनिया में जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत की सुरक्षा और चीन के खिलाफ उठाए जाने वाले कदमों के मामले में पूरा देश एकजुट है और इसमें किसी भी प्रकार का राजनीतिक मतभेद आड़े नहीं आता है। यशवंत सिन्हा का यह कदम इस बात का भी संकेत देता है कि लोकतंत्र में भले ही आंतरिक राजनीति को लेकर सरकार से तीखे सवाल पूछे जाएं, लेकिन जब देश के बाहरी शत्रुओं या रणनीतिक प्रतिद्वंद्वियों का मुकाबला करने की बात आती है, तो सभी जिम्मेदार भारतीय एक ही पाले में खड़े होते हैं। आने वाले दिनों में भारत और चीन के बीच के कूटनीतिक और सामरिक संबंध किस दिशा में आगे बढ़ते हैं, इस पर पूरी दुनिया की नजर टिकी रहेगी, लेकिन यह तय है कि भारत अब अपनी शर्तों पर अपनी विदेश नीति तय कर रहा है।