राजनीति में अपने प्रतिनिधित्व की खुद चिंता करें मुसलमान, किसी भी दल का पिछलग्गू बनकर.....

राजनीति में अपने प्रतिनिधित्व की खुद चिंता करें मुसलमान, किसी भी दल का पिछलग्गू बनकर.....

देश की सियासत में अपनी रणनीतिक और चुनावी पैठ के लिए पहचाने जाने वाले जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और उनकी हिस्सेदारी को लेकर एक बेहद तीखा, स्पष्ट और वैचारिक रूप से झकझोर देने वाला बयान दिया है। एक सार्वजनिक मंच से बात करते हुए प्रशांत किशोर ने दो टूक शब्दों में कहा कि देश के मुसलमानों को अब अपनी राजनीतिक और सामाजिक तकदीर तय करने के लिए खुद ही आगे आना होगा और अपने प्रतिनिधित्व की चिंता स्वयं करनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह सलाह दी कि मुस्लिम समाज को किसी भी राजनीतिक दल के पिछलग्गू या केवल एक तरफा वोट बैंक बनकर रहने की अपनी पुरानी आदत को अब छोड़ देना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से उन्हें कभी भी उनका वास्तविक और आनुपातिक राजनीतिक हक नहीं मिल पाएगा। प्रशांत किशोर के इस बयान के बाद से राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छिड़ गई है और विभिन्न दलों के नेता इस पर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं देने लगे हैं। उनका यह विश्लेषणात्मक बयान ऐसे समय में आया है जब देश के विभिन्न राज्यों में अल्पसंख्यकों की राजनीतिक भूमिका, उनकी सुरक्षा और उनके विकास के मॉडल को लेकर लगातार तीखे वैचारिक संघर्ष और दावे किए जा रहे हैं।

राजनीतिक दलों के दोहरे रवैये और सिर्फ वोट बैंक की राजनीति पर तंज

अपने तीखे अंदाज के लिए मशहूर रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने देश की तमाम प्रमुख राजनीतिक पार्टियों पर करारा प्रहार करते हुए कहा कि आज तक लगभग सभी दलों ने मुसलमानों का इस्तेमाल केवल और केवल चुनाव के वक्त एकतरफा वोट हासिल करने के लिए किया है, लेकिन जब सत्ता में हिस्सेदारी देने की बात आती है तो इन दलों के दरवाजे बंद हो जाते हैं। उन्होंने विस्तार से समझाते हुए कहा कि तथाकथित सेक्युलर पार्टियां भी लंबे समय से यह डर दिखाकर मुस्लिम समाज के वोटों का ध्रुवीकरण करती रही हैं कि अगर उन्होंने उन्हें वोट नहीं दिया तो उनके विरोधी दल सत्ता में आ जाएंगे, और इस डर की राजनीति के चक्रव्यूह में फंसकर मुस्लिम समुदाय ने कभी अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत को उभरने ही नहीं दिया। प्रशांत किशोर ने जोर देकर कहा कि जब तक समुदाय के लोग खुद अपनी जमीन पर खड़े होकर अपने असली मुद्दों, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और प्रशासनिक हिस्सेदारी के लिए मुखर नहीं होंगे, तब तक कोई भी पार्टी उन्हें केवल धर्म के नाम पर लॉलीपॉप थमाकर उनका इस्तेमाल करती रहेगी। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए यह भी बताया कि आज़ादी के इतने दशकों बाद भी देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय की स्थिति सामाजिक और आर्थिक सूचकांकों पर सबसे नीचे बनी हुई है, जिसका सबसे बड़ा कारण यही है कि उनके पास अपनी कोई स्वतंत्र और सौदेबाजी करने वाली राजनीतिक ताकत नहीं है।

जन सुराज के विजन के जरिए समाज को खुद अपना नेतृत्व गढ़ने की सलाह

मुसलमानों को किसी भी राजनीतिक दल के रहममोकरम पर जीने के बजाय अपनी खुद की राजनीतिक धुरी तैयार करने की नसीहत देते हुए प्रशांत किशोर ने अपने अभियान 'जन सुराज' के उद्देश्यों को भी स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी या उनका यह नया राजनीतिक मंच किसी को भी भीख में टिकट या पद देने के बजाय उन जमीनी और सक्षम लोगों को आगे लाने के पक्ष में है जो वास्तव में समाज के उत्थान के लिए काम करना चाहते हैं। प्रशांत किशोर ने आह्वान किया कि युवाओं, बुद्धिजीवियों और जमीनी स्तर पर काम करने वाले नुमाइंदों को अब आगे आकर अपनी पंचायत, अपने शहर और अपने राज्य की राजनीति की कमान खुद अपने हाथों में लेनी चाहिए, ताकि कोई भी नेता या पार्टी उन्हें हल्के में न ले सके। उन्होंने कहा कि जब समाज के लोग खुद अपने उम्मीदवारों का चयन करेंगे और अपनी शर्तों पर राजनीति करेंगे, तभी उन्हें सही मायनों में न्याय और बराबरी का हक मिल सकेगा। उनके इस संदेश को एक नए राजनीतिक प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य पारंपरिक जातिवादी और तुष्टीकरण की राजनीति के सांचे को तोड़कर समाज के हर वर्ग को उसकी वास्तविक और समान भागीदारी दिलाना है।

राजनीतिक विश्लेषकों की प्रतिक्रिया और आगामी चुनावों पर पड़ने वाला प्रभाव

प्रशांत किशोर के इस बेबाक बयान के बाद देश के राजनीतिक विश्लेषकों और जानकारों का मानना है कि उनका यह रुख आने वाले दिनों में खासकर बिहार और अन्य चुनावी राज्यों की राजनीति में एक बड़ा वैचारिक बदलाव ला सकता है। कई राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि पीके की यह बात उन पारंपरिक दलों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो दशकों से अल्पसंख्यकों को केवल एक सुरक्षित वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते आए हैं और उनके विकास के लिए कभी कोई ठोस काम नहीं किया। हालांकि, कुछ आलोचकों का यह भी मानना है कि भारतीय चुनावी प्रणाली की जटिलताओं और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की मौजूदा परिस्थितियों के बीच किसी एक समुदाय के लिए पूरी तरह स्वतंत्र राजनीतिक धुरी तैयार करना आसान काम नहीं होगा, इसके लिए लंबी और कठिन वैचारिक लड़ाई लड़नी होगी। इसके बावजूद, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रशांत किशोर ने जिस सच को खुलकर सबके सामने रखा है, वह लंबे समय से दबी हुई उस कसक को बयां करता है जो देश के आम अल्पसंख्यक नागरिक के मन में हमेशा से सुलगती रही है। अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में इस बयान का जमीनी स्तर पर क्या असर पड़ता है और क्या मुस्लिम समाज इस आह्वान को स्वीकार करते हुए अपनी राजनीतिक दिशा में कोई ऐतिहासिक बदलाव लाने का साहस जुटा पाता है या नहीं।