अब धान की सीधी बुआई तकनीक से होगी पानी की बचत

न्यू लाइफ स्टाइल को देखते- 2 न्यू -2 तकनीकिया भी आ गयी लोगों को नयी नयी सुविधाएं मिलती जा रही हैं जैसा की आप सब को बता दूं

न्यू लाइफ स्टाइल को देखते- 2 न्यू -2 तकनीकिया भी आ गयी लोगों को नयी नयी सुविधाएं मिलती जा रही हैं जैसा की आप सब को बता दूं कि पानी व कामगारों की किल्लत की संभावना को देखते हुए धान की सीधी बुआई तकनीक को विज्ञानी समय की मांग करार दे रहे हैं।

लेकिन किसान इस नई तकनीक को अपनाने से हिचक रहे हैं। अभी भी धान की खेती में रोपाई का ही बोलबाला है। किसानों के मन में सीधी बुआई को लेकर कुछ आशंकाएं हैं।

अच्छी बात यह है कि विज्ञानियों ने इस दिशा में प्रयास शुरू भी किया है। उजवा स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के विज्ञानी दिल्ली देहात के उन गांवों में जहां धान की खेती की जाती है, वहां जाकर पिछले कई दिनों से किसानों को जागरूक करने में जुटे हैं। कुछ प्रगतिशील किसानों ने इस तकनीक को लेकर उत्साह दिखाया है। कादीपुर, कैर, रावता, झटीकरा में कुछ किसानों ने इस विधि को अपनाया है।

पानी की होती है बचत

पानी का अत्यधिक मात्रा में इस्तेमाल मृदा के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इससे खारेपन की समस्या बढ़ती है। भूजल के स्तर में भी कमी आती है। दिल्ली व आसपास के राज्यों की बात करें तो खारापन व भूजल स्तर में तेजी से गिरावट एक बड़ी समस्या है। इस लिहाज से सीधी बुआई तकनीक बेहद लाभकारी है।

धान की परंपरागत खेती की बात करें तो एक किलोग्राम धान उपजाने में करीब 15 हजार लीटर पानी का इस्तेमाल किसान करते हैं। सीधी बुआई तकनीक के इस्तेमाल से इसमें करीब साढ़े चार हजार लीटर पानी की बचत होगी।

धान की सीधी बुआई को लेकर पिछले एक वर्ष से हम लोग दिल्ली देहात के विभिन्न गांवों में किसानों को जागरूक करने में जुटे हैं। सीधी बुआई तकनीक समय की मांग है। किसानों को इसे अपनाना चाहिए। – डॉ. पीके गुप्ता, अध्यक्ष, कृषि विज्ञान केंद्र, उजवा

श्रम की बचत

कृषि विज्ञान केंद्र उजवा के विज्ञानी डॉ. समरपाल सिंह बताते हैं कि धान की नर्सरी तैयार करने से लेकर खेत में रोपाई तक बड़ी संख्या में मजदूरों की जरूरत परंपरागत विधि में पड़ती है। आने वाले समय में दिल्ली व आसपास के राज्यों में कामगारों का संकट उत्पन्न होने की पूरी संभावना है।

कोरोना महामारी के दौरान यह संकट और गहराया है। सीधी बुआई तकनीक में नर्सरी बनाने की जरूरत ही नहीं होती। इसके अलावा रोपाई के बजाय यहां बुआई होती है। बुआई का कार्य मशीन से किया जाता है।
किसानों के मन में संशय

इस तकनीक को लेकर किसानों के मन में कुछ शंकाएं हैं। एक शंका खरपतवार की है। विज्ञानी भी मानते हैं कि सीधी बुआई में खरपतवार प्रबंधन एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। यानि फसल को देखभाल की परंपरागत विधि के मुकाबले अधिक जरूरत पड़ती है। दूसरी समस्या बुआई के बाद जब आती है, जब उन जगहों पर जहां पौध नहीं उगते हैं वहां फिर से बुआई की जरूरत होती है।

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