रिटायरमेंट से 5 दिन पहले IAS अफसर पर ACB का शिकंजा, जमीन घोटाले में FIR
हरियाणा के प्रशासनिक गलियारों में उस समय हड़कंप मच गया जब एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) ने 1995 बैच के सीनियर IAS अधिकारी डी. सुरेश के खिलाफ उनकी सेवानिवृत्ति से महज पांच दिन पहले शिकंजा कस दिया।
मुख्य सचिव की हरी झंडी मिलते ही 26 अगस्त को दर्ज की गई इस एफआईआर में डी. सुरेश समेत कुल नौ लोगों को नामजद किया गया है। यह पूरा विवाद साइबर सिटी गुरुग्राम के प्राइम लोकेशन सेक्टर 23 में स्थित 500 वर्ग गज के एक प्लॉट से जुड़े 3.5 करोड़ रुपये के कथित जमीन घोटाले का है।
कौड़ियों के भाव थमा दिया 3.5 करोड़ का सरकारी प्लॉट
एंटी-करप्शन ब्यूरो की एफआईआर के दस्तावेज बताते हैं कि हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (HSVP) के इस 500 वर्ग गज के प्लॉट का वास्तविक बाजार भाव लगभग 3.5 करोड़ रुपये था। साल 2019 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार भी सेक्टर 23-23A का कलेक्टर रेट 35,000 रुपये प्रति वर्ग गज था, जिसके मुताबिक इसकी न्यूनतम सरकारी कीमत करीब 1.75 करोड़ रुपये बैठती थी। खुले बाजार में तो इसका रेट 70,000 रुपये प्रति वर्ग गज तक आंका जा रहा था। हैरानी की बात यह रही कि करोड़ों की इस बेशकीमती संपत्ति को महज 6.71 लाख रुपये के मामूली दाम पर ट्रांसफर कर दिया गया।
फर्जी नोटशीट और कागजी खेल से खुला 22 साल पुराना राज
यह जमीनी विवाद असल में वर्ष 1988 के मूल आवंटन से शुरू हुआ था, जिसे बाद में बकाया राशि जमा न होने के कारण डिफ़ॉल्ट घोषित कर दिया गया था। भुगतान न मिलने पर HSVP ने साल 2002 में इस प्लॉट को वापस अपने कब्जे में ले लिया था। इसके बाद करीब सात वर्षों तक चली सतर्कता जांच (Vigilance Probe) में इस पूरे सिंडिकेट का भंडाफोड़ हुआ। जांच में सामने आया कि विभागीय अधिकारियों और क्लर्क स्टाफ ने किसी दूसरे प्लॉट को बहाल करने से संबंधित अदालती आदेश की आड़ लेकर इस मामले में फर्जी नोटशीट तैयार की और सरकारी खजाने को भारी चपत लगाते हुए प्रॉपर्टी की कीमत केवल 6.7 लाख रुपये दिखा दी।
तत्कालीन चीफ एडमिनिस्ट्रेटर डी. सुरेश और पूर्व एस्टेट ऑफिसर की भूमिका
जांच रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2019 में HSVP के तत्कालीन चीफ एडमिनिस्ट्रेटर रहे डी. सुरेश ने डिफ़ॉल्ट प्लॉट को वापस लेने के पुराने फैसले को रद्द कर दिया। इसके बाद बेहद कम कीमत पर कन्वेयंस डीड (स्वामित्व हस्तांतरण दस्तावेज) को मंजूरी दिलाने का रास्ता साफ किया गया, जिससे सरकारी राजस्व को करोड़ों रुपये का सीधा नुकसान पहुंचा। इस पूरे मामले में पूर्व एस्टेट ऑफिसर मुकेश कुमार की भूमिका भी सीधे तौर पर जांच के घेरे में आ गई है।