हाथ में सिलाई मशीन और सामने 6.5 करोड़ की दौलत! एक दर्जी की पत्नी ने पूर्व विधायक के परिवार को चटाई धूल

हाथ में सिलाई मशीन और सामने 6.5 करोड़ की दौलत! एक दर्जी की पत्नी ने पूर्व विधायक के परिवार को चटाई धूल

राजस्थान में हाल ही में संपन्न हुए पंचायत चुनावों ने जमीनी लोकतंत्र के ऐसे रंग दिखाए हैं, जिनकी चर्चा आज हर जुबान पर है। कहीं एक वैवाहिक रिश्ते ने दशकों पुराना जातीय समीकरण बदलकर जीत की नई इबारत लिख दी, तो कहीं हाथ में सिलाई मशीन थामकर गुजारा करने वाली एक साधारण महिला ने करोड़ों की संपत्ति और रसूखदार राजनीतिक घराने को चुनावी मैदान में धूल चटा दी। करौली जिले का गुडला गांव और जालोर जिले की भैंसवाड़ा ग्राम पंचायत आज महिला सशक्तिकरण और जनविश्वास के सबसे बड़े प्रतीक बनकर उभरे हैं।

करौली जिले की सादौली ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले गुडला गांव में लंबे समय से गुर्जर समाज का राजनीतिक दबदबा रहा है। इस बार जब सरपंच पद की सीट अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग के लिए आरक्षित हुई, तो गांव में नए नेतृत्व की तलाश शुरू हुई। इसी बीच गांव के युवक राहुल गुर्जर और उनकी पत्नी नैना धानका का नाम सामने आया। नैना धानका समाज से आती हैं और एसटी वर्ग में शामिल हैं। गांव की पंचायत में सर्वसम्मति बनी और गुर्जर व धानका दोनों समाजों ने मिलकर नैना को अपना साझा प्रत्याशी घोषित कर दिया। दोनों जातियों की इस एकजुटता ने चुनावी मुकाबले को एकतरफा बना दिया। कुल 11 उम्मीदवारों के बीच हुए इस मुकाबले में नैना धानका को 2107 वोट मिले, जबकि उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी हरिओम मीणा को मात्र 243 वोट हासिल हुए। नैना ने 1864 वोटों के ऐतिहासिक अंतर से शानदार जीत दर्ज कर अंतरजातीय सामाजिक समरसता की अनूठी मिसाल पेश की।

दूसरी ओर, जालोर जिले के भैंसवाड़ा ग्राम पंचायत की कहानी कड़े संघर्ष, टूटे सपनों और अटूट हौसले की दास्तान कहती है। बीए-बीएड कर चुकीं शारदा कुमारी राणा का सपना कभी सरकारी शिक्षक बनकर बच्चों का भविष्य संवारने का था, लेकिन तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती रद्द होने से उनका यह सपना अधूरा रह गया। इसके बाद उन्होंने हार नहीं मानी और परिवार का हाथ बंटाने के लिए सिलाई का काम शुरू किया। जब भैंसवाड़ा की सीट सामान्य महिला वर्ग के लिए खुली, तो शारदा ने चुनावी समर में उतरने का फैसला किया। मैदान में 11 प्रत्याशी थीं, जिनमें आहोर के पूर्व विधायक माधोसिंह के परिवार की बहू उमाकुमारी भी शामिल थीं। चुनावी हलफनामे के मुताबिक उमाकुमारी के पास 6 करोड़ 56 लाख रुपये से अधिक की संपत्ति थी और उनके पति भी पूर्व सरपंच रह चुके थे।

पैसों और राजनीतिक रसूख के इस मुकाबले में जनता ने सादगी और संघर्ष को तरजीह दी। भैंसवाड़ा में पड़े कुल 2564 वैध मतों में से शारदा कुमारी राणा ने 650 वोट हासिल किए, जबकि उनकी निकटतम प्रतिद्वंद्वी उमाकुमारी को 461 वोट मिले। शारदा ने 189 वोटों से शानदार जीत दर्ज कर साबित कर दिया कि लोकतंत्र में दौलत से ज्यादा मतदाता का विश्वास मायने रखता है। उनके पति अचलेश्वर राणा का कहना है कि वे पूरे गांव को साथ लेकर बुनियादी सुविधाओं और विकास कार्यों को प्राथमिकता देंगे। शिक्षक भर्ती के संघर्ष से निकलकर गांव की 'सरकार' चलाने जा रहीं शारदा राणा और दो समाजों के मेल से जीतीं नैना धानका आज पूरे राजस्थान में बदलाव और उम्मीद का नया चेहरा बन चुकी हैं।