राजस्थान में सरकारी दवाओं के नाम पर बंटा 'जहर'? 131 दवाओं के बैच फेल, फिर भी मरीजों को खिला दी गईं
राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में निशुल्क दवा वितरण की रीढ़ मानी जाने वाली नोडल एजेंसी राजस्थान मेडिकल सर्विस कॉरपोरेशन लिमिटेड (RMSCL) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय निधि अंकेक्षण विभाग की हालिया ऑडिट रिपोर्ट में पिछले डेढ़ से दो वर्षों के दौरान दवाओं की खरीद, रेट कॉन्ट्रैक्ट टेंडर और गुणवत्ता जांच (QC) में बड़े पैमाने पर वित्तीय व प्रशासनिक अनियमितताओं की पुष्टि हुई है।
रिपोर्ट के अनुसार, टेंडर की समय-सीमा खत्म होने के बावजूद एजेंसी ने एक-एक साल तक नए रेट कॉन्ट्रैक्ट जारी नहीं किए, जिसके चलते पूरे प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में जीवनरक्षक दवाओं का गंभीर संकट पैदा हो गया।
दवाओं की कमी से निपटने के लिए अस्पतालों को स्थानीय स्तर (लोकल परचेज) पर अत्यधिक ऊंचे दामों में दवाइयां खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिससे सरकारी खजाने को भारी वित्तीय चपत लगी। राजस्थान ट्रांसपेरेंसी इन पब्लिक प्रोक्योरमेंट (RTPP) नियमों के स्पष्ट प्रावधान हैं कि वर्तमान रेट कॉन्ट्रैक्ट समाप्त होने के तुरंत बाद नया अनुबंध लागू होना अनिवार्य है, ताकि सप्लाई चेन में कोई रुकावट न आए। विशेष परिस्थितियों में पुराने कॉन्ट्रैक्ट को बाजार दरों के सत्यापन के बाद अधिकतम तीन महीने तक ही बढ़ाया जा सकता है, मगर RMSCL ने नियमों की अनदेखी करते हुए महीनों तक प्रक्रिया को लटकाए रखा। सबसे चिंताजनक बात यह रही कि स्थानीय स्तर पर खरीदी गई इन महंगी दवाओं की अनिवार्य गुणवत्ता जांच तक नहीं कराई गई।
ऑडिट रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू दवाओं की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा है। जांच में ऐसे 131 बैच चिन्हित किए गए हैं, जिन्हें खुद क्वालिटी कंट्रोल विंग ने प्रयोगशाला परीक्षण में 'नॉन-स्टैंडर्ड' (गुणवत्ता मानकों पर फेल) घोषित कर दिया था। इसके बावजूद इन अमानक और सब-स्टैंडर्ड दवाओं की सप्लाई पर रोक नहीं लगाई गई और प्रदेश के सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में मरीजों को इनका उपभोग करा दिया गया। रिपोर्ट में कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा गया है कि जांच में फेल दवाओं का वितरण क्वालिटी कंट्रोल सिस्टम के मूल उद्देश्य को पूरी तरह ध्वस्त करता है और यह सीधे तौर पर आम मरीजों की जान को बड़े जोखिम में डालने वाली गंभीर लापरवाही है।