जयपुर में सियासत का नया चेहरा! 22-23 साल के युवा मैदान में, बदलेंगे नगर निगम का खेल

जयपुर में सियासत का नया चेहरा! 22-23 साल के युवा मैदान में, बदलेंगे नगर निगम का खेल

शहरों की बुनियादी समस्याओं को देखने का नजरिया अब तेजी से बदल रहा है। जयपुर नगर निगम के आगामी मुकाबले में पारंपरिक राजनेताओं के दबदबे के बीच एक बड़ा सामाजिक बदलाव देखने को मिल रहा है। इस बार चुनावी मैदान में ऐसे युवाओं की मजबूत मौजूदगी है जो समाज के उस तबके से आते हैं जिनकी आवाज अक्सर सत्ता के गलियारों में दबकर रह जाती थी।

जयपुर प्रभारी रोहित बोहरा के अनुसार पार्टी ने लगभग सैंतीस वर्ष की औसत उम्र वाले प्रत्याशियों पर भरोसा जताया है। इनमें तीस वर्ष से कम उम्र के तीस नौजवान शामिल हैं जबकि पचास वर्ष से नीचे वाले दावेदारों का आंकड़ा एक सौ दस तक पहुंचता है।

अभावों से निकलकर सदन तक: वार्ड बहत्तर में सुमन भाटी का संघर्ष

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे प्रेरक कहानी बाईस वर्षीय सुमन भाटी की है। किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के बिना केवल अपने काम और सेवा भाव के दम पर वह वार्ड बहत्तर से जनता के बीच पहुंची हैं।

झालाना की कच्ची बस्ती में रहकर कपड़े धोने और प्रेस करने का काम करने वाली सुमन ने अभावों को बहुत करीब से महसूस किया है। उनका मानना है कि वार्ड की समस्याएं केवल टूटी सड़कों या नालियों तक सीमित नहीं हैं। वह महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता प्रशिक्षण नशा मुक्ति अभियान और सुरक्षित माहौल को अपनी प्राथमिकता मानती हैं। उनका लक्ष्य बस्तियों में आधुनिक सुरक्षा कैमरे लगवाना और महिला पुलिसकर्मियों की गश्त सुनिश्चित करना है ताकि हाशिए पर खड़े लोगों को भी शहर के विकास में बराबर की हिस्सेदारी मिल सके।

तकनीक और जवाबदेही: वार्ड छियालीस से हर्षिता का डिजिटल एजेंडा

दूसरी तरफ शिक्षित युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहीं तेईस साल की स्नातक हर्षिता जैन वार्ड छियालीस से व्यवस्था में बदलाव की पैरवी कर रही हैं। उनका साफ मानना है कि नगर निगम के काम-काज में जब तक तकनीकी पारदर्शिता नहीं आएगी तब तक आम नागरिक दफ्तरों के चक्कर काटते रहेंगे। वह एक ऐसा डिजिटल तंत्र विकसित करना चाहती हैं जहां नागरिक अपनी परेशानी ऑनलाइन दर्ज करा सकें और संबंधित विभाग की जवाबदेही तय हो। इससे नागरिकों को घर बैठे यह पता चल सकेगा कि उनकी समस्या किस अधिकारी के पास लंबित है और उसका समाधान कब तक संभव होगा।

अनुभव की चुनौती पर सीखने का जज्बा भारी

चुनावी राजनीति में पहली बार कदम रख रहे इन युवा चेहरों के सामने सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक अनुभव की कमी को लेकर उठाया जा रहा है। हालांकि इन प्रत्याशियों का तर्क है कि अनुभव समय और काम के साथ हासिल होता है लेकिन जनता की सेवा करने का सच्चा जज्बा और समर्पण पहले दिन से होना चाहिए। राजस्थान के कुल 309 शहरी निकायों की तुलना में जयपुर में नए दौर की युवा पीढ़ी यानी जेन-जी की भागीदारी सबसे ज्यादा दर्ज की गई है जहां करीब बीस प्रतिशत टिकट युवाओं को दिए गए हैं।

क्या रंग लाएगा यह नया सियासी प्रयोग?

शहरी मतदाता अब पुराने वादों से ऊबकर सुरक्षा डिजिटल गवर्नेंस रोजगार और पारदर्शी व्यवस्था जैसे नए मुद्दों पर वोट करने का मन बना रहा है। ऐसे दौर में यह प्रयोग केवल चुनावी गणित नहीं बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को आम जनता तक पहुंचाने की एक गंभीर कोशिश है। यदि कच्ची बस्तियों और आम परिवारों से निकले ये युवा चेहरे जीत हासिल करते हैं तो यह नगर निगम के सदन में आम जनता की सीधी आवाज बनने की दिशा में एक ऐतिहासिक शुरुआत साबित होगी।