राजस्थान बना ‘बाघस्थान’: कभी महज 18-20 बाघों के वजूद पर था संकट, अब मरुधरा में दहाड़ रहे हैं 149 बाघ; जानें शानदार रिकवरी की इनसाइड स्टोरी
वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण के क्षेत्र में राजस्थान ने देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के सामने एक अनूठी मिसाल पेश की है। कभी रेत के धोरों और किलों के लिए पहचाना जाने वाला राजस्थान अब 'बाघस्थान' (Land of Tigers) के रूप में नई पहचान बना चुका है। अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस (International Tiger Day) के मौके पर मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, राजस्थान के पांचों प्रमुख टाइगर रिजर्व में बाघ, बाघिन और शावकों का कुनबा बढ़कर 149 तक पहुंच गया है।
यह आंकड़ा इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि पिछले साल (2025) राज्य में 135 बाघ थे। वहीं, अगर दो दशक पहले (साल 2005-08 के दौर) की बात करें, तो शिकार और कमजोर मैनेजमेंट के चलते राजस्थान में कुल 18 से 20 बाघ ही बचे थे और सरिस्का पूरी तरह बाघविहीन हो गया था।
5 टाइगर रिजर्व में बढ़ा कुनबा, रणथंभौर सबसे आगे
मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के.सी. अरुण प्रसाद के अनुसार, वर्तमान में राज्य के 149 बाघों में से 96 वयस्क बाघ-बाघिन हैं और बाकी शावक (Cubs) हैं। राज्य के विभिन्न अभयारण्यों में यह संख्या कुछ इस तरह है:
-
रणथंभौर टाइगर रिजर्व (Ranthambore): यह हमेशा की तरह राज्य में बाघों का सबसे बड़ा गढ़ बना हुआ है। यहाँ बाघों की संख्या पिछले साल के 66 से बढ़कर 72 हो गई है (लगभग 50 वयस्क और 22 शावक)।
-
सरिस्का टाइगर रिजर्व (Sariska): जो अभयारण्य कभी शून्य पर पहुंच गया था, वहां अब 56 बाघ दहाड़ रहे हैं, जो पिछले साल 50 थे। इस साल सबसे ज्यादा 28 शावकों का जन्म अकेले सरिस्का में ही दर्ज किया गया है।
-
मुकुंदरा हिल्स, रामगढ़ विषधारी और धौलपुर-करौली: बाकी बचे हुए बाघ इन तीन नए और तेजी से विकसित हो रहे टाइगर रिजर्व में मौजूद हैं।
कैसे मुमकिन हुआ यह चमत्कार? 3 मुख्य कारण
वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, मरुधरा के जंगलों में बाघों की इस रिकॉर्ड वृद्धि के पीछे ठोस रणनीतियां रही हैं:
-
शानदार ब्रीडिंग और शावकों का सर्वाइवल रेट: इस वर्ष पांचों अभयारण्यों में 54 बाघिनों ने रिकॉर्ड 53 शावकों को जन्म दिया है, जबकि 2025 में 52 बाघिनों से 43 शावक पैदा हुए थे। रणथंभौर में शावकों के जीवित रहने की दर (Survival Rate) लगभग 80% है, जो देश में सबसे बेहतर है।
-
समृद्ध प्रे-बेस (शिकार की प्रचुरता): रणथंभौर और सरिस्का के उपवन संरक्षकों के मुताबिक, जंगलों में सांभर, चीतल और अन्य शाकाहारी जीवों की पर्याप्त उपलब्धता और विकसित घासभूमि (Grasslands) ने बाघों के अनुकूल माहौल तैयार किया है।
-
मछली (T-16) का लीगेसी वंश: राजस्थान के बाघों के पुनरुद्धार की कहानी विश्व प्रसिद्ध बाघिन 'मछली' के बिना अधूरी है। मछली ने अपने जीवनकाल में 18 शावकों को जन्म दिया था। उसके ही वंशजों को सरिस्का, मुकुंदरा और रामगढ़ विषधारी में पुनर्वासित (Translocate) कर नए सिरे से इन अभयारण्यों को आबाद किया गया।
बढ़ती आबादी के साथ खड़ी हुई 'होम थियेटर' की नई चुनौती
बाघों की संख्या बढ़ना जितना उत्साहजनक है, वन विभाग के लिए यह उतनी ही बड़ी चुनौती भी लेकर आया है।
वहन क्षमता (Carrying Capacity) से बाहर: उदाहरण के लिए, रणथंभौर टाइगर रिजर्व का कोर एरिया 40 से 50 बाघों को संभालने की क्षमता रखता है, लेकिन वहां इस समय 72 बाघ रह रहे हैं।
चूंकि एक वयस्क नर बाघ को अपने दायरे के लिए 40 से 50 वर्ग किलोमीटर का इलाका चाहिए होता है, ऐसे में टेरिटरी (इलाके की लड़ाई) के कारण युवा बाघ अब जंगलों से बाहर नए कॉरीडोर तलाश रहे हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में इंसानी संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) को रोकने के लिए करौली के कैलादेवी वन्यजीव अभयारण्य का तेजी से एकीकरण और बाघों का अन्य कम आबादी वाले अभयारण्यों में सुरक्षित शिफ्टिंग बेहद जरूरी है।