बेरोजगारों की सबसे बड़ी जीत! राजस्थान हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से नर्सिंग अभ्यर्थियों में दौड़ी खुशी की लहर
राजस्थान के उन हजारों नर्सिंग अभ्यर्थियों के लिए एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर आई है जो लंबे समय से अपने हक के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे।
राजस्थान हाईकोर्ट ने नर्सिंग ऑफिसर भर्ती 2023 से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले में बेरोजगार युवाओं के पक्ष में ऐतिहासिक निर्णय दिया है। अदालत ने साफ लफ्जों में कहा है कि यदि किसी अभ्यर्थी ने सरकारी अस्पताल में या सरकार द्वारा स्वीकृत पद पर अपनी सेवाएं दी हैं तो उसे अनुभव का लाभ मिलना ही चाहिए।
सरकार केवल इस तकनीकी आधार पर किसी का हक नहीं मार सकती कि उसके वेतन का भुगतान किसी ट्रस्ट, एनजीओ या पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल के जरिए किया गया था।
वकीलों की दलील और कोविड काल की सेवाओं का सम्मान
इस पूरे मामले में याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता हिमांशु पारीक ने अदालत के सामने जमीनी हकीकत बयां की। उन्होंने दलील दी कि इन अभ्यर्थियों ने साल 2019 से ही सरकारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में स्वीकृत पदों पर नर्सिंग स्टाफ के रूप में अपनी जान जोखिम में डालकर काम किया है।
खासकर कोरोना महामारी के भयानक दौर में भी इन युवाओं ने निरंतर चिकित्सा सेवाएं दीं। ऐसे में सिर्फ वेतन देने वाली एजेंसी या माध्यम के आधार पर उनके अनुभव प्रमाण पत्रों को रद्दी का टुकड़ा समझ लेना पूरी तरह से गैरकानूनी और भर्ती नियमों के खिलाफ है। अदालत ने इस तर्क को बेहद गंभीरता से लिया।
हाईकोर्ट के अंतिम आदेश पर एक नजर
मामले की सुनवाई करते हुए डॉ. न्यायमूर्ति नुपुर भाटी ने न्याय के पुराने सिद्धांतों को दोहराया। उन्होंने पूर्व में आए गोविंद दायमा प्रकरण के फैसले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी कर्मचारी के अनुभव का आकलन इस बात से होना चाहिए कि उसने किस संस्थान में और किस प्रकृति का काम किया है। वेतन किस खाते से आया, इससे अनुभव की सत्यता पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
अपने अंतिम आदेश में हाईकोर्ट ने अभ्यर्थियों की उम्मीदवारी रद्द करने वाले सरकारी फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने राज्य सरकार को पाबंद किया है कि इन सभी को कार्यानुभव के आधार पर बोनस अंक दिए जाएं और मेरिट में आने पर आठ हफ्ते के भीतर नर्सिंग ऑफिसर पद पर नियुक्ति पत्र जारी किया जाए।