हल्के में न लें 'गांव की सरकार', पंचायत चुनावों से ही निकले हैं राजस्थान के ये 5 सबसे ताकतवर नेता
राजस्थान में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों की आहट के साथ ही ग्रामीण सियासत में सरगर्मी चरम पर पहुंच गई है। स्थानीय स्तर पर इसे भले ही 'गांव की सरकार' चुनने की कवायद माना जाता हो, मगर प्रदेश की मुख्यधारा की राजनीति की नर्सरी यही पंचायती राज संस्थाएं रही हैं। राजस्थान का सियासी इतिहास गवाह है कि सत्ता के शिखर पर काबिज आज के दिग्गज कर्णधारों ने अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआती ककहरा इन्हीं ग्राम पंचायतों और जिला परिषदों से सीखा है। सीएम भजनलाल शर्मा, पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा, डिप्टी सीएम डॉ. प्रेमचंद बैरवा से लेकर डॉ. किरोड़ी लाल मीणा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली तक, सभी के सियासी सफर की मजबूत नींव पंचायत स्तर पर ही पड़ी थी।
भजनलाल ने सरपंच बनकर पहली बार जीता था जनता का विश्वास
प्रदेश के मौजूदा सीएम भजनलाल शर्मा का सफर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भरतपुर के अटारी गांव के रहने वाले भजनलाल ने महज 27 साल की उम्र में सरपंच बनकर पहली बार जनता का विश्वास जीता था। इसके बाद भाजपा युवा मोर्चा और मुख्य संगठन में जिला स्तर से लेकर लगातार तीन बार प्रदेश महामंत्री की जिम्मेदारी संभालने वाले भजनलाल शर्मा ने 2023 में पहली बार सांगानेर से विधायकी का चुनाव लड़ा और सीधे सूबे के सीएम पद तक जा पहुंचे।
वहीं, कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने साल 2005 में सीकर जिले की लक्ष्मणगढ़ पंचायत समिति का सदस्य और फिर प्रधान बनकर ग्रामीण स्तर पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई, जिसकी बदौलत वे 2008 से लगातार विधानसभा जीतते आ रहे हैं और पिछली सरकार में शिक्षा मंत्री भी रहे।
डिप्टी सीएम डॉ. प्रेमचंद बैरवा ने भी साल 2000 में दूदू के वार्ड 15 से जिला परिषद सदस्य जीतकर सक्रिय राजनीति में कदम रखा था, जिसके बाद 2013 में वे पहली बार विधायक और अब प्रदेश के डिप्टी सीएम बने। राजनीति के कद्दावर चेहरे डॉ. किरोड़ी लाल मीणा ने 1985 में विधायक बनने के बाद 1995 से 1998 के दौरान दौसा जिला परिषद के जिला प्रमुख की कमान संभाली और बाद में छह बार विधायक, दो बार लोकसभा व एक बार राज्यसभा सांसद बने।
अलवर की जमीन से निकलकर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बने टीकाराम जूली ने 2005 से 2008 तक अलवर जिला प्रमुख के रूप में अपनी प्रशासनिक व राजनीतिक क्षमता साबित की और फिर राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री तक पहुंचे। पूर्व मंत्री विश्वेंद्र सिंह ने भी 1988 में भरतपुर के जिला प्रमुख पद से ही अपनी जनपक्षीय पहचान गढ़ी थी।
राजस्थान के प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवारों के सियासी रसूख में भी पंचायती राज की केंद्रीय भूमिका रही है। मारवाड़ के दिग्गज नेता परसराम मदेरणा ने 1953 में चाड़ी गांव का सरपंच बनकर सफर शुरू किया, जो आगे चलकर नौ बार विधायक, कैबिनेट मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष बने; उनकी यह विरासत आज भी कायम है जहां उनके बेटे महिपाल मदेरणा के बाद अब लीला मदेरणा जोधपुर जिला प्रमुख हैं।
शेखावाटी के कद्दावर नेता शीशराम ओला 1948 में अरड़ावता के सरपंच से लेकर दो बार झुंझुनूं के जिला प्रमुख, सांसद और केंद्रीय मंत्री बने, जिनकी अगली पीढ़ियों में बेटे बृजेंद्र ओला और बहू डॉ. राजबाला ने भी जिला प्रमुख रहकर परिवार का जनाधार संभाला। इसी तरह नागौर के रसूखदार मिर्धा परिवार से हरेंद्र मिर्धा ने भी नागौर जिला प्रमुख की जिम्मेदारी संभालकर अपनी संसदीय पहचान को मजबूती दी और वर्तमान में विधायक हैं। साफ है कि राजस्थान में पंचायत चुनाव महज स्थानीय नुमाइंदगी का जरिया नहीं, बल्कि प्रादेशिक और राष्ट्रीय नेतृत्व तैयार करने की सबसे मुफीद सियासी जमीन हैं।