सिर्फ 8 साल की उम्र में कैसे बने नंदी महाराज भगवान शिव का वाहन? जानिए शिलाद ऋषि के पुत्र की अनोखी और दिव्य कथा

सिर्फ 8 साल की उम्र में कैसे बने नंदी महाराज भगवान शिव का वाहन? जानिए शिलाद ऋषि के पुत्र की अनोखी और दिव्य कथा

हिंदू धर्म में भगवान शिव की पूजा के साथ उनके प्रिय वाहन नंदी (वृषभ) की पूजा का भी विशेष विधान है। बिना नंदी के दर्शन के शिव आराधना अधूरी मानी जाती है। मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश करने से पहले नंदी महाराज के दर्शन किए जाते हैं। क्या आप जानते हैं कि हमेशा शांत और बलवान दिखने वाले नंदी जी का जन्म कैसे हुआ था और महज 8 साल की उम्र में उन्होंने भगवान शिव का वाहन बनने का गौरव कैसे प्राप्त किया? आइए पुराणों में वर्णित इस अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक कथा के बारे में विस्तार से जानते हैं।

शिलाद ऋषि की तपस्या और दिव्य पुत्र की प्राप्ति

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में शिलाद नामक एक महान ऋषि हुआ करते थे। शिलाद ऋषि ने मृत्यु पर विजय प्राप्त करने और अजर-अमर होने की कामना के साथ भगवान इंद्र को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर जब देवराज इंद्र प्रकट हुए, तो शिलाद ने बिना किसी जन्म-मृत्यु के चक्र वाले अमर पुत्र का वरदान मांगा। इंद्र ने इसे असंभव बताते हुए उन्हें भगवान शिव की तपस्या करने की सलाह दी। इसके बाद शिलाद ऋषि ने अघोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया। भोलेनाथ ने स्वयं प्रकट होकर उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे स्वयं उनके पुत्र के रूप में उनके यहां जन्म लेंगे।

खेतों में खेलते हुए मिला था बालक नंदी को यह रूप

कुछ समय बीतने के बाद, जब शिलाद ऋषि अपने खेतों की जुताई कर रहे थे, तो जमीन से एक अति सुंदर और तेजस्वी बालक प्रकट हुआ। उस बालक की अलोकिक आभा देखकर ऋषि अचंभित रह गए। तभी आकाशवाणी हुई कि इस बालक का नाम 'नंदी' रखा जाए और यह असाधारण गुणों से संपन्न होगा। शिलाद ऋषि उस बालक को अपने आश्रम ले आए और उसका पालन-पोषण करने लगे। नंदी अल्प आयु से ही वेदों, पुराणों और शास्त्रों के ज्ञानी बन गए और शिव भक्ति में लीन रहने लगे।

जब ऋषियों ने दी नंदी को अल्पायु होने की भविष्यवाणी

एक दिन, आश्रम में मित्र और वशिष्ठ नामक दो महान ऋषि पधारे। नंदी ने बड़े आदर-सत्कार के साथ दोनों ऋषियों की सेवा की। ऋषियों ने बालक नंदी की सेवा से प्रसन्न होकर उसे दीर्घायु होने का आशीर्वाद दिया, लेकिन मित्र ऋषि उदास हो गए। जब शिलाद ऋषि ने इसका कारण पूछा, तो मित्र ऋषि ने बताया कि नंदी केवल 8 वर्ष की अल्पायु है और इस आयु के बाद इसकी मृत्यु हो जाएगी। यह सुनकर पिता शिलाद का दिल टूट गया, लेकिन बालक नंदी पूरी तरह शांत और अडिग रहे। उन्होंने अपने पिता से कहा कि जिसका जीवन भगवान शिव को समर्पित है, उसे मृत्यु का भय कैसा होना चाहिए।

भगवान शिव ने नंदी को बनाया अपना वाहन और गणों का अध्यक्ष

अपनी मृत्यु के समीप जानकर 8 साल के बालक नंदी ने नर्मदा नदी के तट पर बैठकर भगवान शिव की कठिन तपस्या शुरू कर दी। नंदी की अगाध भक्ति और समर्पण को देखकर भोलेनाथ तुरंत प्रकट हुए। शिवजी ने नंदी की अकाल मृत्यु के योग को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। भगवान शिव ने नंदी को गले से लगाया और वरदान दिया कि वे कभी बूढ़े नहीं होंगे और हमेशा अमर रहेंगे। इसके साथ ही शिवजी ने नंदी को अपने वाहन (वृषभ) के रूप में स्वीकार किया और अपने समस्त गणों का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। तभी से सनातन परंपरा में भगवान शिव के साथ नंदी की पूजा का विधान है और उन्हें प्रथम भक्त व वाहन के रूप में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।

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