विराजते हैं भगवान विट्ठल, पंढरपुर के इस पावन धाम में दर्शन से पहले क्यों जरूरी है भक्त पुंडलीक की पूजा
भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में स्थित पंढरपुर (Pandharpur) का विठोबा मंदिर देश भर के करोड़ों वारकरी संप्रदाय और सनातन भक्तों की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। चंद्रभागा नदी के तट पर बसे इस पावन धाम में भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप भगवान विट्ठल (विठोबा) और माता रुक्मिणी अपने भक्तों को आशीर्वाद देने के लिए ईंट पर खड़े हैं। महाराष्ट्र के कोने-कोने से हर साल लाखों श्रद्धालु 'ज्ञानेश्वर माउली' और 'तुकाराम महाराज' के जयकारों के साथ आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी पर पंढरपुर की पैदल वारी करते हैं। लेकिन पंढरपुर की इस तीर्थयात्रा और मंदिर परंपरा से जुड़ा एक ऐसा रहस्य और नियम है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। भगवान विट्ठल के मुख्य गर्भगृह में प्रवेश करने और उनके चरणों में माथा टेकने से पहले हर भक्त को नगर के मुख्य मंदिर से कुछ दूरी पर स्थित संत पुंडलीक के मंदिर जाकर उनकी पूजा करना अनिवार्य माना जाता है। आखिर क्या है इस परंपरा के पीछे का पौराणिक इतिहास और क्यों भगवान विट्ठल से भी पहले भक्त पुंडलीक को पूजा जाता है?
भक्त पुंडलीक की माता-पिता की अद्भुत सेवा और भगवान विट्ठल के खुद उनके द्वार पर खड़े होने की पौराणिक कथा
इस अनूठी परंपरा के पीछे हिंदू पौराणिक कथाओं और भक्ति काल का एक बेहद प्रेरणादायक इतिहास जुड़ा हुआ है। कथा के अनुसार, प्राचीन काल में पुंडलीक नाम का एक अत्यंत आज्ञाकारी और सेवाभावी पुत्र रहता था, जो अपने वृद्ध और अंधे माता-पिता की दिन-रात सेवा किया करता था। उसकी इस निष्काम सेवा और पितृभक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण, विट्ठल के रूप में उसके द्वार पर पधारे। उस समय पुंडलीक अपने माता-पिता के पैर दबा रहे थे, इसलिए उन्होंने भगवान के खड़े होने के लिए बाहर एक ईंट फेंक दी और कहा कि वे थोड़ी देर प्रतीक्षा करें। भक्त की अपने माता-पिता के प्रति इस अगाध निष्ठा और समर्पण को देखकर भगवान विट्ठल उसी ईंट पर आज भी खड़े हैं। जब पुंडलीक को इस बात का अहसास हुआ कि उनके द्वार पर स्वयं जगत के पालनहार आए हैं, तो उन्होंने भगवान से वरदान मांगा कि वे हमेशा इसी रूप में पंढरपुर में निवास करें और उनके नाम से ही इस नगर की पहचान हो।
मुख्य मंदिर में प्रवेश से पहले भक्त पुंडलीक मंदिर के दर्शन का विधान और पंढरपुर की आध्यात्मिक महिमा
यही कारण है कि पंढरपुर आने वाला प्रत्येक वारकरी और श्रद्धालु सबसे पहले चंद्रभागा नदी में स्नान करने के बाद भक्त पुंडलीक के मंदिर (पुंडलीक मंदिर) में जाकर उनकी पूजा-अर्चना करता है। धार्मिक मान्यता है कि जब तक कोई भक्त अपने अहंकार का त्याग कर भक्त पुंडलीक के प्रति सम्मान प्रकट नहीं करता और उनकी पूजा नहीं करता, तब तक भगवान विट्ठल के दर्शन का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। पुंडलीक मंदिर चंद्रभागा नदी के तट पर ही स्थित है, जहां भक्त सबसे पहले हाथ जोड़कर पुंडलीक महाराज का आशीर्वाद लेते हैं और उसके बाद ही मुख्य विठोबा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। यह परंपरा हमें यह सिखाती है कि सनातन संस्कृति में भगवान की भक्ति के साथ-साथ माता-पिता और गुरु की सेवा का क्या सर्वोच्च स्थान है।
पंढरपुर का यह पूरा प्रांगण हमेशा 'विठ्ठल-विठ्ठल' के महामंत्र से गूंजता रहता है। आज के आधुनिक दौर में भी जब लोग भागदौड़ भरी जिंदगी से सुकून पाने के लिए तीर्थयात्राओं का रुख करते हैं, तो पंढरपुर की यह वारी और परंपराएं उन्हें आत्मिक शांति और पारिवारिक संस्कारों का पाठ पढ़ाती हैं। महाराष्ट्र के इस पावन नगर में देश के विभिन्न राज्यों से आने वाले पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए भी यह स्थान गहरी रिसर्च का केंद्र बना हुआ है। यदि आप भी जीवन में कभी पंढरपुर के दर्शन के लिए जाएं, तो इस पवित्र नियम का पालन करना बिल्कुल न भूलें, क्योंकि भक्त पुंडलीक के आशीर्वाद के बिना भगवान विट्ठल की यह महान यात्रा अधूरी मानी जाती है।