न द्रौपदी का अपमान, न शकुनि की चाल... जानिए महाभारत युद्ध के पीछे किस 'स्त्री' का था हाथ?
महाभारत का युद्ध (Mahabharat War) केवल कुरुक्षेत्र के मैदान में लड़ा गया एक खूनी संघर्ष नहीं था, बल्कि यह धर्म, अधर्म, कर्म और उसके परिणामों का एक ऐसा महाकाव्य है जिसके हर एक पन्ने पर अनगिनत रहस्य दबे हुए हैं। जब भी किसी से यह सवाल पूछा जाता है कि महाभारत के विनाशकारी युद्ध के पीछे मुख्य कारण क्या था, तो आमतौर पर लोगों के जुबान पर द्रौपदी का चीरहरण, उनका वह प्रसिद्ध व्यंग्य "अंधे का पुत्र अंधा", या फिर मामा शकुनि की चालें और कौरवों की हठधर्मिता का नाम आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन सभी घटनाओं से भी बहुत पहले इस भीषण युद्ध की पटकथा लिख दी गई थी? क्या कौरवों और पांडवों के बीच हुए इस महाविनाश के पीछे पर्दे के पीछे छिपी किसी खास स्त्री का हाथ था? आइए आज हम आपको इतिहास के उन पन्नों से रूबरू कराते हैं जो इस महायुद्ध के सबसे बड़े और गहरे राज से पर्दा उठाते हैं।
द्रौपदी का अपमान और शकुनि की चौसर: वे घटनाएं जिन्होंने आग में घी का काम किया
इसमें कोई दो राय नहीं है कि द्रौपदी का चीरहरण और भरी सभा में उनका अपमान महाभारत के युद्ध को टालने के सभी रास्ते बंद करने के लिए सबसे बड़ी वजह बना। द्रौपदी के खुले हुए बाल और उनके आंसुओं ने पांडवों के भीतर बदले की ऐसी आग सुलगार्दी थी जिसे शांत करना नामुमकिन हो गया था। इसके अलावा, मामा शकुनि द्वारा रचे गए चौसर के खेल और पांडवों के साथ हुआ छल-कपट भी इस युद्ध का एक तात्कालिक और बड़ा कारण था। हर कोई यही मानता है कि यदि जुए में युधिष्ठिर अपना सब कुछ न हारते और द्रौपदी का अपमान न होता, तो शायद कुरुक्षेत्र का मैदान खून से न लाल होता। लेकिन इन सभी घटनाओं को केवल एक चिंगारी माना जा सकता है, जबकि इस महायुद्ध की विशाल इमारत की नींव बहुत पहले ही रखी जा चुकी थी।
अंबा और शिखंडी का प्रतिशोध: वह स्त्री जिसके पुनर्जन्म ने रची थी विनाश की पूरी कहानी
जब हम महाभारत युद्ध के पीछे किसी स्त्री के मुख्य हाथ की बात करते हैं, तो सबसे पहला और सबसे मजबूत नाम राजकुमारी अंबा (Princess Amba) का आता है। कथा के अनुसार, काशी नरेश की तीन पुत्रियों—अंबा, अंबिका और अंबालिका—में से बड़ी पुत्री अंबा का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार विचित्रवीर्य से तय हुआ था, लेकिन भीष्म पितामह ने स्वयंवर से तीनों राजकुमारियों का अपहरण कर लिया था। अंबा ने भीष्म को यह बताया कि वह शाल्व राज से प्रेम करती है, तब भीष्म ने उसे सम्मानपूर्वक मुक्त कर दिया। लेकिन जब शाल्व ने अंबा को अपनाने से इंकार कर दिया, तो अंबा ने अपने इस अपमान और दुर्दशा का एकमात्र कारण भीष्म पितामह को माना। अंबा ने भीष्म से विवाह का आग्रह किया, लेकिन ब्रह्मचर्य व्रत के कारण भीष्म ने असमर्थता जताई।
भगवान शिव की तपस्या और शिखंडी के रूप में जन्म लेकर भीष्म की मृत्यु का कारण बनना
भीष्म पितामह द्वारा ठुकराए जाने के बाद अंबा ने घोर तपस्या की और भगवान शिव से यह वरदान प्राप्त किया कि वह अगले जन्म में भीष्म की मृत्यु का कारण बनेगी। इसके बाद अंबा ने आत्मदाह कर लिया और राजा द्रुपद के घर राजकुमारी शिखंडी के रूप में पुनर्जन्म लिया। शिखंडी (जो पूर्व जन्म में अंबा थीं) के रूप में उस स्त्री के भीतर वर्षों का प्रतिशोध सुलग रहा था। महाभारत के युद्ध के दसवें दिन जब भीष्म पितामह अर्जुन के सामने अजेय बनकर खड़े थे और कौरवों की सेना को सुरक्षित रखे हुए थे, तब अर्जुन ने शिखंडी को अपने आगे ढाल बनाकर खड़ा किया। भीष्म पितामह ने स्त्री (या स्त्री रूप में जन्में शिखंडी) पर शस्त्र न उठाने की अपनी प्रतिज्ञा के कारण अपने हथियार डाल दिए, और अर्जुन के बाणों से वे शैया पर गिर पड़े। इस प्रकार, उस एक स्त्री की प्रतिशोध की आग ने कुरुक्षेत्र के सबसे शक्तिशाली योद्धा का अंत कर दिया।
गांधारी का मौन और धृतराष्ट्र का मोह: वह ममता और हठ जिसने करवा दिया संपूर्ण कुल का नाश
अंबा के अलावा एक और महान स्त्री का चरित्र इस युद्ध के लिए प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार माना जाता है, और वह थीं गांधारी (Gandhari)। गांधारी ने जब यह देखा कि उनके पति धृतराष्ट्र जन्म से अंधे हैं, तो उन्होंने अपनी आंखों पर हमेशा के लिए पट्टी बांध ली ताकि वे अपने पति के अंधेपन के दुख में साझीदार बन सकें। लेकिन रानी और एक मां के रूप में गांधारी अपने पुत्र दुर्योधन के प्रति अंधी ममता और मोह से कभी खुद को मुक्त नहीं कर पाईं। जब दुर्योधन अधर्म के रास्ते पर चल रहा था और बार-बार पांडवों का हक मार रहा था, तब एक धर्मपरायण और न्यायप्रिय पत्नी व माता होने के नाते गांधारी का यह कर्तव्य था कि वे अपने बेटे को रोकतीं। लेकिन उनका मौन और पुत्र मोह ने दुर्योधन को इतना अहंकारी बना दिया कि वह विनाश के रास्ते पर चल पड़ा। अंत में युद्ध समाप्त होने के बाद जब गांधारी ने अपने सौ पुत्रों के शव देखे, तो उनके उस क्रूर विलाप और भगवान श्रीकृष्ण को दिए गए शाप ने इस संपूर्ण गाथा को एक त्रासदी में बदल दिया।