उत्तर भारत की इस पवित्र जगह पर लिए थे शिव-पार्वती ने 7 फेरे, आज भी धधक रहा है वह दिव्य अग्निकुंड; जानिए मान्यता
भारतीय सनातन संस्कृति में विवाह को दो आत्माओं का एक पवित्र बंधन माना जाता है, जिसमें अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लिए जाते हैं। क्या आप जानते हैं कि इस ब्रह्मांड के आदि दंपती भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह किस स्थान पर हुआ था और उन्होंने किनकी उपस्थिति और किस अग्नि को साक्षी मानकर फेरे लिए थे? उत्तर भारत में स्थित यह पावन स्थल आज भी अपनी अलौकिक पौराणिक कथाओं के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है, जहां आज भी वह दिव्य अग्निकुंड अखंड रूप से प्रज्वलित है जिसमें शिव-पार्वती ने एक-दूसरे का हाथ थाम था। आइए जानते हैं इस रहस्यमयी और पवित्र जगह के बारे में विस्तार से।
उत्तराखंड का त्रियुगीनारायण मंदिर: जहां रचा गया था महाविवाह
भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह का यह ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल देवभूमि उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है, जिसे 'त्रियुगीनारायण मंदिर' (Triyuginarayan Temple) के नाम से जाना जाता है। समुद्र तल से लगभग 1,980 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह प्राचीन मंदिर अपनी भव्य वास्तुकला और गहरी पौराणिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है। मान्यता है कि त्रेता और द्वापर युग से भी पहले यानी सत्य युग में जब शिव और सती का पुनर्जन्म हिमालय राज की पुत्री पार्वती के रूप में हुआ था, तब उनका विवाह इसी पवित्र प्रांगण में संपन्न हुआ था।
आज भी धधक रहा है वह अखंड अग्निकुंड
इस मंदिर की सबसे बड़ी और चमत्कारिक विशेषता इसके प्रांगण में जलने वाला वह हवन कुंड है, जिसे 'अखंड धूनी' या त्रियुगीनारायण अग्निकुंड कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी कुंड की साक्षी और पवित्र अग्नि के फेरे लेकर माता पार्वती और भगवान शिव वैवाहिक सूत्र में बंधे थे। खास बात यह है कि त्रेता, द्वापर और कलियुग—इन तीनों युगों से यह पावन अग्नि आज भी लगातार धधक रही है। इस कुंड की राख को श्रद्धालु बेहद पवित्र मानते हैं और इसे अपने साथ प्रसाद के रूप में घर ले जाते हैं, जिसके बारे में मान्यता है कि यह वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली लेकर आती है।
भगवान विष्णु बने थे भाई, ब्रह्मा बने थे पुरोहित
शिव-पार्वती के इस दिव्य विवाह से जुड़ी कई अन्य रोचक कथाएं भी इस स्थान से जुड़ी हुई हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस महाविवाह में जगत के पालनहार भगवान विष्णु ने माता पार्वती के भाई की भूमिका निभाई थी और सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा इस विवाह के मुख्य पुरोहित (पुजारी) बने थे। विवाह से पहले सभी देवी-देवता इसी स्थान पर एकत्रित हुए थे और पास में ही स्थित विभिन्न कुंडों (जैसे ब्रह्म कुंड, विष्णु कुंड और रुद्र कुंड) में स्नान किया था, जिनके अवशेष आज भी यहां देखे जा सकते हैं।
वेडिंग डेस्टिनेशन और श्रद्धालुओं की पहली पसंद
आज के आधुनिक दौर में त्रियुगीनारायण मंदिर केवल एक धार्मिक तीर्थ स्थल ही नहीं, बल्कि देश-विदेश के पर्यटकों और जोड़ों के लिए एक लोकप्रिय डेस्टिनेशन वेडिंग स्पॉट भी बनता जा रहा है। लोगों की गहरी आस्था है कि जो भी जोड़ा इस पावन और ऐतिहासिक अग्निकुंड के फेरे लेकर अपने नए जीवन की शुरुआत करता है, उनका बंधन सात जन्मों तक अटूट रहता है। भगवान शिव और माता पार्वती के आशीर्वाद की कामना लिए हर साल हजारों श्रद्धालु इस दिव्य धाम के दर्शन करने पहुंचते हैं।