कामिका एकादशी पर बन रहा दुर्लभ द्विपुष्कर योग का महासंयोग, नोट करें पूजा का शुभ मुहूर्त और पारण का सही समय
सावन मास के पवित्र महीने में आने वाली कामिका एकादशी का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व होता है। इस साल सावन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी यानी कामिका एकादशी पर एक बेहद दुर्लभ और शुभ संयोग का निर्माण हो रहा है, जिससे इस व्रत का फल कई गुना अधिक बढ़ गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस बार कामिका एकादशी के दिन 'द्विपुष्कर योग' का अद्भुत संयोग बन रहा है, जो मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जा रहा है। आइए जानते हैं कामिका एकादशी की तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त, द्विपुष्कर योग का समय और व्रत पारण का नियम।
कब है कामिका एकादशी और क्या है द्विपुष्कर योग का महत्व?
पंचांग के अनुसार, सावन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ और व्रत काे लेकर श्रद्धालुओं में काफी उत्साह है। सनातन धर्म में एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इस पावन अवसर पर जब द्विपुष्कर योग का संयोग बनता है, तो इस अवधि में किए गए पूजा-पाठ, दान-पुण्य और अनुष्ठान का फल दोगुना या कई गुना प्राप्त होता है। ऐसा माना जाता है कि इस योग में शुभ कार्य करने से सफलता के योग और अधिक मजबूत होते हैं।
कामिका एकादशी 2026 पूजा का शुभ मुहूर्त
भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए विधि-विधान से पूजा करना बेहद जरूरी है। पंचांगीय गणना के आधार पर कामिका एकादशी के दिन पूजा के लिए निम्नलिखित शुभ मुहूर्त बन रहे हैं:
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ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:15 बजे से 05:00 बजे तक
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अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:00 बजे से 12:52 बजे तक
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विजय मुहूर्त: दोपहर 02:45 बजे से 03:38 बजे तक
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गोधूलि मुहूर्त: शाम 07:05 बजे से 07:27 बजे तक
व्रत पारण का सही समय और नियम
एकादशी व्रत का समापन यानी पारण द्वादशी तिथि के दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है। नियमों के अनुसार, व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना आवश्यक होता है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो रही हो, तो सूर्योदय के बाद किसी भी समय विधि-वत भगवान विष्णु की पूजा करके और ब्राह्मण को भोजन या दान देकर व्रत खोला जाता है। पारण के दिन सात्विक भोजन का ही सेवन करना चाहिए।
कामिका एकादशी पूजा की सरल विधि
कामिका एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। भगवान को पीले फूल, पंचामृत, तुलसी दल, फल, रो अक्षत और मिष्ठान अर्पित करें। विष्णु सहस्रनाम या 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें। अंत में आरती करके प्रसाद वितरित करें। सावन मास में भगवान विष्णु के साथ भोलेनाथ की भी कृपा पाने के लिए यह दिन सर्वश्रेष्ठ माना गया है।