पौराणिक काल के साक्षी हैं ये चमत्कारी शिवधाम: पांडवों और रामायण काल से है सीधा संबंध, इस सावन जरूर करें दर्शन
सावन (श्रावण) का पवित्र महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। इस दौरान देश के कोने-कोने में स्थित शिवालयों में भक्तों का तांता लगा रहता है। लेकिन भारत में कुछ ऐसे भी बेहद प्राचीन और चमत्कारी शिवधाम हैं, जिनका इतिहास सीधा महाभारत और रामायण काल से जुड़ा हुआ है। इन मंदिरों में की गई पूजा का फल कई गुना अधिक माना जाता है। अगर आप भी इस सावन किसी ऐतिहासिक और अलौकिक आध्यात्मिक यात्रा पर जाने की सोच रहे हैं, तो इन चार पौराणिक शिवधामों के दर्शन का प्लान तुरंत बना लीजिए।
1. टपकेश्वर महादेव मंदिर, उत्तराखंड (गुरु द्रोणाचार्य और अश्वत्थामा की तपस्थली)
देवभूमि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में तमसा नदी के तट पर स्थित टपकेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है। यह एक प्राकृतिक गुफा में स्थित स्वयंभू शिवलिंग है, जहां गुफा की छत से निरंतर पानी की बूंदें शिवलिंग पर टपकती रहती हैं।
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पौराणिक संबंध: मान्यता है कि यह स्थान महाभारत काल में पांडवों और कौरवों के गुरु द्रोणाचार्य की तपस्थली था। यहीं पर उनके पुत्र अश्वत्थामा का जन्म हुआ था। जब बालक अश्वत्थामा को दूध नहीं मिला, तो उन्होंने इसी गुफा में भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने गुफा की छत से दूध की धारा बहा दी थी, जो कलयुग में पानी की बूंदों के रूप में आज भी टपकती है।
2. लाखा मंडल शिव मंदिर, उत्तराखंड (पांडवों का लाक्षागृह)
देहरादून जिले के जौनसार-बावर क्षेत्र में यमुना नदी के तट पर स्थित लाखा मंडल मंदिर वास्तुकला और रहस्यों का बेजोड़ नमूना है। यहां पर एक बेहद खूबसूरत ग्रेफाइट (चमकदार पत्थर) का शिवलिंग स्थापित है, जिस पर जल चढ़ाने से व्यक्ति को अपना चेहरा आईने की तरह साफ दिखाई देता है।
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पौराणिक संबंध: महाभारत काल में दुर्योधन ने पांडवों को जिंदा जलाने के लिए जिस 'लाक्षागृह' (लाख का महल) का निर्माण करवाया था, वह यही स्थान माना जाता है। पांडव जब सुरंग के रास्ते सुरक्षित बाहर निकले, तो उन्होंने इसी स्थान पर शरण ली थी। यहां माता कुंती ने एक लाख शिवलिंगों की स्थापना कर भगवान शिव की आराधना की थी, इसीलिए इसका नाम 'लाखा मंडल' पड़ा।
3. बागेश्वर महादेव मंदिर, उत्तर प्रदेश (रामायण काल और सुग्रीव का संबंध)
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के अनूपशहर (छोटी काशी) के पास स्थित बागेश्वर महादेव मंदिर रामायण कालीन इतिहास को समेटे हुए है। यह मंदिर गंगा के पावन तट के समीप स्थित है और सावन के महीने में यहां कांवड़ियों का भारी हुजूम उमड़ता है।
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पौराणिक संबंध: धार्मिक ग्रंथों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, रामायण काल में वानर राज सुग्रीव ने इस स्थान पर आकर भगवान शिव की कठोर आराधना की थी। सुग्रीव की भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें दर्शन दिए थे और यहां स्वयंभू रूप में प्रकट हुए थे। यह मंदिर त्रेतायुग से लेकर आज तक भक्तों की आस्था का एक बहुत बड़ा केंद्र बना हुआ है।
4. रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग, तमिलनाडु (प्रभु श्री राम द्वारा स्थापित शिवलिंग)
द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक, तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित रामेश्वरम मंदिर भारत के चार धामों में से भी एक है। हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी से घिरा यह भव्य मंदिर रामायण काल का सबसे बड़ा और जीवंत प्रमाण है।
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पौराणिक संबंध: लंका पर चढ़ाई करने और रावण का वध करने से पहले प्रभु श्री राम ने समुद्र तट पर विजय प्राप्ति के लिए भगवान शिव की पूजा करने का निश्चय किया था। श्री राम ने माता सीता से बालू (रेत) का शिवलिंग बनाने को कहा, जिसे 'रामनाथ' कहा गया। इसके अलावा, हनुमान जी भी लंकापति रावण पर विजय के बाद ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति के लिए कैलाश से एक शिवलिंग (विश्वलिंग) लेकर आए थे। यह धाम सावन के महीने में मोक्ष और मनोकामना पूर्ति के लिए सबसे उत्तम माना जाता है।