सावन में सोमवार के व्रत का क्या है असली रहस्य? जानिए पौराणिक कथाएं और क्यों महादेव को सबसे प्रिय है यह दिन!
श्रावण मास की शुरुआत होते ही चारों तरफ 'हर-हर महादेव' और 'बम-बम भोले' की गूंज सुनाई देने लगती है। सावन के महीने में भगवान शिव की आराधना का विशेष फल मिलता है, लेकिन इस पूरे महीने में सोमवार के दिन व्रत रखने और पूजा करने का क्रेज सबसे ज्यादा देखा जाता है। हिंदू धर्म में सावन के सोमवार को अत्यधिक पवित्र और फलदायी माना गया है। आखिर सावन के महीने में सोमवार के दिन ही व्रत रखने के पीछे क्या धार्मिक और पौराणिक कारण हैं और इस दिन की पूजा से महादेव क्यों तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं, आइए जानते हैं इसके पीछे का गहरा रहस्य।
चंद्रमा के कष्ट निवारण से जुड़ा है सोमवार और भोलेनाथ का अटूट नाता पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सोमवार का नाम 'सोम' शब्द से बना है, जिसका एक अर्थ चंद्रमा होता है। भगवान शिव ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण किया हुआ है, इसलिए उन्हें चंद्रशेखर भी कहा जाता है। कथाओं के अनुसार, जब चंद्रमा को राजा दक्ष के श्राप के कारण क्षय रोग (टीबी) हो गया था और उनका तेज खत्म होने लगा था, तब चंद्रमा ने इसी पवित्र महीने में सोमवार के दिन कठोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया था। महादेव ने चंद्रमा के कष्टों का निवारण कर उन्हें पुनर्जीवन दिया था। तभी से सोमवार का दिन भगवान शिव की भक्ति और मानसिक शांति के लिए सबसे उत्तम माना जाने लगा।
माता पार्वती ने भोलेनाथ को पति रूप में पाने के लिए किए थे ये कठिन व्रत सावन सोमवार व्रत का एक बेहद महत्वपूर्ण संबंध माता पार्वती से भी जुड़ा है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, माता सती ने अपने दूसरे जन्म में पार्वती के रूप में राजा हिमालय के घर जन्म लिया था। उन्होंने भगवान शिव को दोबारा अपने पति के रूप में प्राप्त करने के लिए युवावस्था में श्रावण मास के पूरे महीने निराहार रहकर और सोमवार के कठोर व्रत करके घोर तपस्या की थी। माता पार्वती की इस निश्छल भक्ति और कठोर व्रत से प्रसन्न होकर महादेव ने सावन के महीने में ही उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था। यही कारण है कि आज भी कुंवारी कन्याएं मनचाहा जीवनसाथी पाने के लिए और सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए सावन सोमवार का व्रत पूरी निष्ठा से रखती हैं।
समुद्र मंथन, विषपान और सावन के महीने का विशेष संयोग एक अन्य प्रसिद्ध पौराणिक कथा के अनुसार, देवताओं और असुरों के बीच हुआ ऐतिहासिक समुद्र मंथन सावन के महीने में ही हुआ था। मंथन के दौरान जब चौदह रत्नों के साथ भयंकर 'हलाहल विष' निकला, तो सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए महादेव ने उस विष को अपने कंठ में समाहित कर लिया। विष के प्रभाव से शिव जी का कंठ नीला पड़ गया और उनका पूरा शरीर अत्यधिक गर्म हो गया। तब देवताओं ने उनके शरीर को शीतलता प्रदान करने के लिए उन पर पवित्र जल और दूध की वर्षा की थी। सावन के सोमवार को शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र चढ़ाने की यह परंपरा उसी समय से चली आ रही है ताकि महादेव को शीतलता मिले और वे प्रसन्न रहें।
सावन सोमवार पूजा का महत्व और मिलने वाले चमत्कारी आध्यात्मिक लाभ ज्योतिष शास्त्र और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोमवार का कारक ग्रह चंद्रमा है, जो सीधे तौर पर मनुष्य के मन और भावनाओं को नियंत्रित करता है। सावन सोमवार के दिन व्रत रखने और शिवलिंग का अभिषेक करने से व्यक्ति की कुंडली में मौजूद चंद्र दोष दूर होता है और मानसिक तनाव, डिप्रेशन या अशांति से मुक्ति मिलती है। इस दिन सच्चे मन से की गई पूजा से भगवान शिव अपने भक्तों के सभी प्रकार के शारीरिक, दैविक और भौतिक कष्टों को हर लेते हैं। सावन सोमवार का व्रत रखने से न केवल आध्यात्मिक बल मिलता है, बल्कि घर में सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।