भगवान शिव से जब पूछा गया उनके दादा-परदादा का नाम... जानिए कैसे त्रिदेवों में सर्वश्रेष्ठ बनकर कहलाए 'महादेव'

भगवान शिव से जब पूछा गया उनके दादा-परदादा का नाम... जानिए कैसे त्रिदेवों में सर्वश्रेष्ठ बनकर कहलाए 'महादेव'

सनातन धर्म में भगवान शिव को अनादि और अनंत माना गया है, यानी जिनका न कोई आरंभ है और न ही कोई अंत। वे स्वयंभू हैं, जो स्वयं प्रकट हुए हैं। अक्सर लोगों के मन में यह जिज्ञासा होती है कि यदि ब्रह्मा जी को सृष्टि का रचयिता और विष्णु जी को पालनहार माना जाता है, तो शिव जी की उत्पत्ति कैसे हुई? पौराणिक ग्रंथों और शिव महापुराण में एक बेहद ही ज्ञानवर्धक और रोचक कथा का वर्णन मिलता है, जब एक ऋषि ने स्वयं भगवान शिव से उनके पिता, दादा और परदादा के नाम को लेकर सवाल पूछ लिया था। इस सवाल पर भोलेनाथ ने जो उत्तर दिया, उसने सृष्टि के सबसे बड़े गूढ़ रहस्य को उजागर कर दिया।

जब ऋषि ने भोलेनाथ से पूछा- कौन हैं आपके पिता?

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवर्षि और कुछ विद्वान ऋषियों के बीच इस बात को लेकर बहस छिड़ गई कि इस ब्रह्मांड का परम सत्य और सबका मार्गदाता कौन है? इस शंका के समाधान के लिए वे सभी भगवान शिव के पास पहुंचे। ऋषियों ने विनम्रतापूर्वक महादेव से पूछा, "हे प्रभु! आप सबके तारणहार हैं, लेकिन हम यह जानना चाहते हैं कि आपके पिता कौन हैं?" भगवान शिव ने बिना किसी संकोच के मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "ऋषिवर, ब्रह्मा जी मेरे पिता हैं।" शिव जी का यह उत्तर सुनकर ऋषि अचंभित रह गए।

...और जब बात दादा और परदादा तक जा पहुंची

ऋषियों की जिज्ञासा यहीं शांत नहीं हुई। उन्होंने अगला सवाल दागा, "हे देवाधिदेव! अगर ब्रह्मा जी आपके पिता हैं, तो फिर आपके दादा (पिता के पिता) कौन हैं?" इस पर भगवान शिव ने बेहद शांत स्वर में कहा, "इस पूरी सृष्टि के पालनहार, भगवान विष्णु ही मेरे दादा हैं।" शिव जी के इस जवाब ने ऋषियों को और गहरे असमंजस में डाल दिया। उन्होंने तुरंत अपना आखिरी और सबसे तार्किक सवाल पूछा, "प्रभु, यदि ब्रह्मा जी आपके पिता हैं और विष्णु जी आपके दादा, तो फिर आपके परदादा (दादा के पिता) कौन हैं?"

महादेव के इस अंतिम उत्तर ने सबको कर दिया निरुत्तर

ऋषियों के इस अंतिम सवाल पर महादेव जोर से हंसे और उन्होंने जो कहा, वह संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल सत्य है। भगवान शिव ने कहा, "शंका मत करो ऋषिवर, स्वयं मैं ही अपना परदादा हूं।" इसका अर्थ यह था कि भगवान शिव किसी मानवीय प्रक्रिया या वंश परंपरा से बंधे नहीं हैं। वे ही परम ब्रह्म हैं, जिन्होंने सृष्टि की रचना के लिए सबसे पहले स्वयं को प्रकट किया, फिर अपने से विष्णु और ब्रह्मा जी को उत्पन्न किया। इस प्रकार, वे स्वयं अपने पूर्वज और इस पूरी सृष्टि के एकमात्र मूल आधार हैं।

यह अद्भुत कथा यह प्रमाणित करती है कि शिव ही शून्य हैं और शिव ही अनंत हैं। इसी सर्वोच्च सत्ता और परम सत्य के कारण उन्हें देवताओं में सबसे ऊपर 'देवों के देव महादेव' का स्थान मिला। जो भी भक्त सावन के इस पावन महीने में शिव के इस स्वरूप का ध्यान करता है, उसे जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है।

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