कामदेव ने क्यों चलाया था महादेव पर कामबाण? जानिए देवताओं की वह लाचारी जिसने भगवान शिव को दिया प्रचंड क्रोध

कामदेव ने क्यों चलाया था महादेव पर कामबाण? जानिए देवताओं की वह लाचारी जिसने भगवान शिव को दिया प्रचंड क्रोध

सनातन धर्म के ग्रंथों और पौराणिक कथाओं में भगवान शिव के तीसरे नेत्र (Third Eye) के खुलने और कामदेव के भस्म होने की कथा बेहद प्रसिद्ध है। लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि प्रेम और वासना के देवता कामदेव ने आखिर ऐसा आत्मघाती कदम क्यों उठाया? उन्होंने संसार के सबसे विनाशकारी और परम योगी भगवान शिव को अपने तीरों का निशाना क्यों बनाया? इसके पीछे एक गहरा रहस्य और देवताओं की एक ऐसी लाचारी छिपी थी, जिसके कारण कामदेव को अपनी आहुति देनी पड़ी। आइए जानते हैं शिव महापुराण की इस विहंगम कथा को।

तारकासुर का आतंक और ब्रह्मा जी का वह वरदान

इस पूरी घटना की पृष्ठभूमि में 'तारकासुर' नाम का एक पराक्रमी और क्रूर राक्षस था। उसने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या करके यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसकी मृत्यु केवल और केवल भगवान शिव के पुत्र (संतान) के हाथों ही हो सकती है। तारकासुर बेहद चालाक था; वह जानता था कि माता सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव पूरी तरह से वैराग्य धारण कर चुके हैं और वे हिमालय की कंदराओं में गहरी समाधि (Meditation) में लीन हैं। शिव कभी विवाह नहीं करेंगे, तो उनकी संतान भी नहीं होगी और इस तरह वह अमर रहेगा। वरदान मिलते ही तारकासुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया और देवताओं को स्वर्ग से खदेड़ दिया।

जब देवताओं ने कामदेव को बनाया अपना 'हथियार'

तारकासुर के अत्याचारों से त्रस्त होकर सभी देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी ने उन्हें याद दिलाया कि जब तक शिव जी की समाधि भंग नहीं होगी, तब तक उनका ध्यान माता पार्वती (जो सती का ही पुनर्जन्म थीं) की तरफ नहीं जाएगा और न ही कार्तिकेय का जन्म होगा। शिव जी की समाधि को तोड़ना साक्षात मृत्यु को आमंत्रण देने जैसा था। ऐसे में देवताओं ने इस बेहद कठिन और खतरनाक कार्य के लिए प्रेम, सौंदर्य और काम के देवता कामदेव को चुना। कामदेव शुरुआत में इस कार्य के लिए तैयार नहीं थे, क्योंकि वे महादेव के क्रोध से भली-भांति परिचित थे, लेकिन सृष्टि की रक्षा और देवताओं की करुण पुकार को देखते हुए उन्होंने अपने प्राणों की बाजी लगाने का फैसला किया।

कामबाण चलते ही फूटा महादेव का तीसरा नेत्र

कामदेव अपनी पत्नी रति के साथ उस स्थान पर पहुंचे जहां भगवान शिव समाधिस्थ थे। कामदेव ने सबसे पहले वहां कृत्रिम 'बसंत ऋतु' का निर्माण किया। अचानक चारों तरफ फूल खिलने लगे, शीतल हवाएं चलने लगीं और पूरा वातावरण कामुक हो गया। जब इससे भी शिव जी की समाधि नहीं टूटी, तब कामदेव ने एक आम के वृक्ष के पीछे छिपकर अपने धनुष पर 'कामबाण' (पुष्प बाण) चढ़ाया और सीधे महादेव के हृदय को निशाना बनाकर चला दिया।

बाण सीधे शिव जी के हृदय में लगा, जिससे उनकी सदियों पुरानी समाधि अचानक भंग हो गई। जैसे ही महादेव ने अपनी आंखें खोलीं, उनके भीतर काम की भावना जागृत होने लगी, जिससे वे अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने अपने ध्यान को विचलित करने वाले कारण को ढूंढने के लिए चारों तरफ देखा। तभी उनकी नजर पेड़ के पीछे छिपे कामदेव पर पड़ी।

कामदेव का भस्म होना और अनंग अवतार का रहस्य

क्रोध की अधिकता के कारण भगवान शिव का तीसरा नेत्र (Third Eye) खुल गया। उस नेत्र से इतनी भयंकर और तीव्र अग्नि निकली कि कामदेव देखते ही देखते वहीं जलकर भस्म (राख) हो गए। कामदेव की पत्नी रति यह देखकर विलाप करने लगीं और उन्होंने शिव जी से न्याय की गुहार लगाई। तब महादेव का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने रति को ढांढस बंधाते हुए कहा कि कामदेव ने यह कार्य लोक कल्याण के लिए किया है, इसलिए वे नष्ट होकर भी अमर रहेंगे। वे बिना शरीर के पूरे संसार में वास करेंगे, जिसके कारण उन्हें 'अनंग' (बिना अंग वाले) कहा गया। शिव जी ने वरदान दिया कि द्वापर युग में जब भगवान कृष्ण का अवतार होगा, तब कामदेव उनके पुत्र 'प्रद्युम्न' के रूप में पुनर्जन्म लेंगे और रति को पुनः प्राप्त होंगे। इसी घटना के बाद शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ और तारकासुर का वध करने वाले स्वामी कार्तिकेय का जन्म हुआ।

Latest Posts