जौनपुर के लाल का कमाल: कॉमनवेल्थ गेम्स में लहराया तिरंगा, कभी बांस के डंडों से प्रैक्टिस कर किसान के बेटे ने रचा इतिहास
खेल की दुनिया में कब कौन सी माटी से हीरा निकलकर चमक जाए, कोई नहीं जानता। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के एक सामान्य से परिवार से ताल्लुक रखने वाले युवा एथलीट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर पूरी दुनिया में महफिल लूट ली है। इस प्रतिभावान खिलाड़ी ने कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे प्रतिष्ठित मंच पर शानदार प्रदर्शन करते हुए मेडल अपने नाम किया है। लेकिन इस चमकदार सफलता के पीछे का सफर इतना आसान नहीं था। गरीबी, संसाधनों की भारी कमी और दो जून की रोटी के संघर्ष के बीच इस युवा ने जिस जज्बे के साथ अपना मुकाम हासिल किया है, उसकी कहानी हर किसी की आंखें नम करने के साथ-साथ सीना चौड़ा कर देती है।
किसान पिता की आर्थिक तंगी और बांस के डंडों से शुरू हुआ सफर
जौनपुर के इस उभरते हुए स्टार एथलीट के घर की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। उनके पिता एक साधारण किसान हैं जो खेतों में दिन-रात मेहनत करके परिवार का पेट पालते थे। बेटे के अंदर खेल के प्रति अटूट लगन और कुछ कर गुजरने का जज्बा देखकर पिता ने हरसंभव कोशिश की, लेकिन हालात ऐसे थे कि प्रोफेशनल ट्रेनिंग और महंगे खेल उपकरणों का खर्च उठाना उनके बस की बात नहीं थी। जेवलिन थ्रो (भाला फेंक) के इस खिलाड़ी के पास एक ढंग का प्रोफेशनल भाला खरीदने तक के पैसे नहीं थे। ऐसे में हार मानने के बजाय उन्होंने गांव के ही खेतों और मैदानों में बांस के डंडों से जुगाड़ करके अपनी प्रैक्टिस शुरू की। बांस के डंडों को ही भाला मानकर घंटों पसीना बहाने वाले इस लड़के के हौसले के आगे अभाव भी घुटने टेकने पर मजबूर हो गए।
संघर्षों को पीछे छोड़ दुनिया के मंच पर लहराया परचम
कड़ी मेहनत, मां-बाप का आशीर्वाद और खुद पर अटूट विश्वास के दम पर इस युवा ने लोकल मैदानों से निकलकर नेशनल और फिर इंटरनेशनल एरिना तक का सफर तय किया। जब उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स के फाइनल मुकाबले में अपना दमखम दिखाया, तो पूरी दुनिया देखती रह गई। संसाधनों के अभाव में पले-बढ़े इस किसान के बेटे ने साबित कर दिया कि सफलता पैसों या सुख-सुविधाओं की मोहताज नहीं होती, बल्कि मजबूत इच्छाशक्ति और पक्के इरादों से लिखी जाती है। उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि से न केवल जौनपुर बल्कि पूरे देश में जश्न का माहौल है और हर कोई उनके इस संघर्षपूर्ण सफर को सलाम कर रहा है।