यूपी के सरकारी स्कूलों में शिफ्ट होंगे 15,613 आंगनबाड़ी केंद्र, मिलेंगी पढ़ाई और पोषण की बेहतर सुविधाएं

यूपी के सरकारी स्कूलों में शिफ्ट होंगे 15,613 आंगनबाड़ी केंद्र, मिलेंगी पढ़ाई और पोषण की बेहतर सुविधाएं

मानसून के मौसम में बारिश की फुहारें जहां एक तरफ गर्मी से राहत दिलाती हैं, वहीं दूसरी तरफ देश के कई हिस्सों में यह प्रशासन की पोल खोलने के लिए काफी होती हैं। जरा सोचिए, उस मां पर क्या गुजर रही होगी जिसने अपने कलेजे के टुकड़ों को सुबह हंसते हुए स्कूल या खेलने भेजा हो और कुछ ही घंटों बाद वे घर केवल एक बेजान जिस्म बनकर लौटें। उत्तर प्रदेश या अन्य शहरी इलाकों में सड़क किनारे या निर्माण स्थलों पर खोदे गए जानलेवा गड्ढे अब केवल पानी का जलाशय नहीं, बल्कि मासूमों के लिए मौत का कुआं बन चुके हैं। हाल ही में हुई ऐसी ही एक दर्दनाक घटना ने एक बार फिर सिस्टम के दावों और जिम्मेदार विभागों की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

बारिश का पानी नहीं, सिस्टम की नाकामी में डूबीं दो जिंदगियां

घटना स्थल का मंजर इतना खौफनाक था कि देखने वालों का कलेजा कांप उठे। जलभराव की समस्या से निपटने में नाकामयाब रहे प्रशासन द्वारा छोड़े गए खुले और गहरे गड्ढे में जब बारिश का पानी भरा, तो वह बच्चों को नजर नहीं आया। दोनों मासूम खेलते-खेलते अनजाने में उस खतरनाक जाल में जा फंसे। जब तक स्थानीय लोग और परिजन वहां पहुंचते, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। यह कोई कुदरती हादसा नहीं था, बल्कि नगर निगम, विकास प्राधिकरण और लापरवाह ठेकेदारों की मिलीभगत से उपजी वह आपराधिक लापरवाही थी, जिसने दो हंसते-खेलते परिवारों का सब कुछ उजाड़ कर रख दिया।

कागजी दावों और सुरक्षा मानकों की उड़ रही हैं धज्जियां

सरकारी नियमों के मुताबिक, किसी भी निर्माण स्थल, सीवर लाइन या सड़क किनारे खोदे गए गड्ढे के चारों ओर बैरिकेडिंग करना और चेतावनी बोर्ड लगाना अनिवार्य होता है। लेकिन धरातल की सच्चाई इन कागजी आदेशों से बिल्कुल उलट है। शहर के अलग-अलग कोनों में बिना किसी सुरक्षा घेरे के खुले छोड़े गए ये गड्ढे आए दिन किसी बड़े हादसे को न्योता देते रहते हैं। जिम्मेदार अधिकारी अपनी जिम्मेदारी एक-दूसरे के विभागों पर थोपकर पल्ला झाड़ लेते हैं, जबकि खामियाजा आम जनता को अपनी या अपने बच्चों की जान देकर चुकाना पड़ता है।

जनता का फूटा गुस्सा, सख्त कार्रवाई की उठी मांग

इस मर्मस्पर्शी हादसे के बाद स्थानीय नागरिकों और परिजनों का गुस्सा फूट पड़ा है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते प्रशासन ने संवेदनशीलता दिखाई होती और खुले गड्ढों को भर दिया जाता, तो आज वे दो मासूम हमारे बीच जिंदा होते। लोग अब केवल मुआवजे की मांग नहीं कर रहे, बल्कि उन लापरवाह अधिकारियों और ठेकेदारों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने और सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार को इस तरह का गम न सहना पड़े।

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