अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामला: आरोपी सुभाष श्रीवास्तव को बड़ी राहत, हाई कोर्ट के आदेश के बाद पेंशन खाते से हटी रोक
अयोध्या के ऐतिहासिक राम जन्मभूमि मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए दान (चढ़ावे) की कथित चोरी के मामले में नामजद आरोपी सुभाष श्रीवास्तव को अदालत से एक बेहद महत्वपूर्ण राहत मिली है। कानूनी प्रक्रिया के तहत लंबे समय से फ्रीज (सीज) किए गए उनके पेंशन बैंक खाते को अब दोबारा से चालू करने का आदेश दे दिया गया है। इस फैसले के बाद आरोपी के उस बैंक खाते से लगी सभी कानूनी रोक हट गई हैं, जिसमें उनकी जीवनभर की कमाई यानी पेंशन की राशि आती थी। कोर्ट के इस रुख को इस हाई-प्रोफाइल मामले में आरोपी पक्ष के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है।
जीवनयापन का अधिकार और पेंशन पर हाई कोर्ट का कड़ा रुख न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति पर लगे आरोपों की जांच और उसकी बुनियादी आजीविका के साधनों को पूरी तरह रोक देना अलग-अलग विषय हैं। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, पेंशन किसी भी रिटायर्ड कर्मचारी के जीवनयापन का मौलिक अधिकार है और इसे बिना किसी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के अनिश्चितकाल के लिए फ्रीज नहीं रखा जा सकता। अदालत ने संबंधित बैंक और जांच एजेंसियों को निर्देश जारी किया है कि वे सुभाष श्रीवास्तव के पेंशन खाते को तुरंत प्रभाव से अनफ्रीज करें ताकि वे अपनी रोजमर्रा की जरूरतों और कानूनी लड़ाई का खर्च उठा सकें।
क्या है पूरा राम मंदिर चढ़ावा चोरी विवाद? यह पूरा मामला अयोध्या में राम लला के भव्य मंदिर निर्माण और दर्शन शुरू होने के बाद सामने आए वित्तीय विवाद से जुड़ा है। मंदिर ट्रस्ट और स्थानीय प्रशासन को राम मंदिर के दानपात्र और ऑनलाइन चढ़ावे में कुछ गड़बड़ी की शिकायतें मिली थीं, जिसके बाद आंतरिक जांच के आधार पर सुभाष श्रीवास्तव समेत कुछ लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। जांच एजेंसियों ने कार्रवाई आगे बढ़ाते हुए वित्तीय संपत्तियों और बैंक खातों पर रोक लगा दी थी, जिसमें आरोपी का पेंशन खाता भी शामिल हो गया था। हालांकि, मुख्य मामले की जांच और अदालती ट्रायल अभी भी जारी है।
अयोध्या और लखनऊ के कानूनी गलियारों में फैसले की चर्चा राम मंदिर से जुड़ा मामला होने के कारण इस फैसले पर उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में काफी उत्सुकता है। अयोध्या, लखनऊ और प्रयागराज के कानूनी हलकों में इस बात पर बहस तेज हो गई है कि वित्तीय अपराधों के मामलों में आरोपी की निजी या सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) के बाद मिलने वाली राशि पर किस हद तक पाबंदी लगाई जा सकती है। स्थानीय स्तर पर इस आदेश को एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है, जो यह तय करता है कि आपराधिक जांच के दौरान भी आरोपी के बुनियादी अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए।