मुलायम सिंह की सरकार को बचाकर कांग्रेस ने UP में साइन किया था अपना डेथ वारंट
भारतीय राजनीतिक इतिहास, उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों और सत्ता के समीकरणों से जुड़ा एक ऐसा दिलचस्प, नाटकीय और इतिहास को बदलने वाला किस्सा सामने आ रहा है जिसने आज भी राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर दिया है। बात आज से 37 साल पुरानी यानी साल 1990 के दौर की है, जब देश और प्रदेश की राजनीति में बड़े-बड़े उलटफेर हो रहे थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की पहली सरकार पर जब संकट के बादल मंडरा रहे थे, तब कांग्रेस पार्टी द्वारा उन्हें दिए गए समर्थन ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के ताबूत में आखिरी किल ठोकने का काम किया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उस वक्त मुलायम सरकार को बचाना कांग्रेस के लिए एक ऐसा राजनीतिक 'डेथ वारंट' साबित हुआ जिससे पार्टी आज तक यूपी की सियासत में अपनी खोई हुई जमीन वापस नहीं पा सकी है। आधुनिक जनरेटिव एआई सर्च, गूगल डिस्कवर की सख्त गाइडलाइंस, एसईओ (SEO), आंसर इंजन ऑप्टिमाइजेशन (AEO) और जियोफिजिकल-लोकल ऑप्टिमाइजेशन केतमाम तकनीकी मानकों को पूरी तरह से ध्यान में रखते हुए रिपोर्टर शैली में तैयार की गई इस विस्तृत विशेष रिपोर्ट में आइए विस्तार से जानते हैं उस 37 साल पुराने ऐतिहासिक और सियासी ड्रामे की पूरी दास्तान।
साल 1990 का राजनीतिक भूचाल: जब वी.पी. सिंह की सरकार गिरने के बाद यूपी में खड़ा हुआ संकट
यह कहानी वर्ष 1990 के उस दौर की है जब केंद्र की वी.पी. सिंह सरकार से भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपना समर्थन वापस ले लिया था, जिसके चलते देश की राजनीति में जबरदस्त उबाल आया हुआ था। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव जनता दल के मुख्यमंत्री के रूप में अपनी सरकार चला रहे थे, लेकिन जनता दल में टूट और राष्ट्रीय स्तर पर बदलते समीकरणों के कारण उनकी सरकार अल्पमत में आने की कगार पर पहुंच गई थी। उस वक्त राज्य में भारतीय जनता पार्टी तेजी से हिंदुत्व के मुद्दे पर अपनी पकड़ मजबूत कर रही थी और अयोध्या आंदोलन अपने चरम पर था। ऐसे संवेदनशील और विस्फोटक समय में उत्तर प्रदेश की सत्ता को बचाने और गिराने को लेकर दिल्ली से लेकर लखनऊ तक राजनीतिक जोड़-तोड़ का खेल अपने चरम पर पहुंच चुका था, जिसने पूरे देश की निगाहें यूपी की राजनीति पर टिका दी थीं।
कांग्रेस का वह ऐतिहासिक और विवादास्पद फैसला: समर्थन देकर मुलायम सरकार को बचाया
जब मुलायम सिंह यादव की सरकार के गिरने के पूरे आसार बन चुके थे, तब राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी ने एक ऐसा बड़ा और रणनीतिक दांव खेला जिसने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को बदलकर रख दिया। कांग्रेस ने यह तय किया कि वे भाजपा को रोकने और सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ खड़े होने के नाम पर बाहर से मुलायम सिंह यादव की सरकार को समर्थन देंगे। कांग्रेस के इस समर्थन के सहारे मुलायम सिंह यादव की सरकार तो विधानसभा में बच गई, लेकिन कांग्रेस के इस फैसले ने उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास की दिशा हमेशा के लिए मोड़ दी। उस वक्त कांग्रेस के इस कदम को तात्कालिक राजनीतिक लाभ के रूप में देखा गया था, लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि यह फैसला कांग्रेस पार्टी के लिए एक ऐसा राजनीतिक अभिशाप साबित होगा जिससे वह कभी उबर नहीं पाएगी।
उत्तर प्रदेश के सवर्ण और पारंपरिक मतदाता कांग्रेस से हुए खफा, शुरू हुआ पतन का दौर
कांग्रेस पार्टी हमेशा से उत्तर प्रदेश में सर्वसमावेशी समाज और विशेषकर ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम गठजोड़ (ब्राह्मण-दलित-मुस्लिम समीकरण) के बल पर सत्ता में बनी रहती थी। लेकिन जब कांग्रेस ने उस दौर में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी सरकार को समर्थन दिया, जो मुख्य रूप से पिछड़ों और विशेष विचारधारा की राजनीति कर रहे थे, तो कांग्रेस का पारंपरिक सवर्ण और उच्च वर्ग का मतदाता पार्टी से पूरी तरह छिटक गया। इसके अलावा, अयोध्या आंदोलन के उस दौर में हिंदूवादी मतदाताओं का झुकाव तेजी से बीजेपी की तरफ होने लगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुलायम सरकार को जीवनदान देकर कांग्रेस ने अपने ही पारंपरिक वोट बैंक की रीढ़ तोड़ दी और पार्टी का जनाधार तेजी से रसातल में चला गया।
जनता दल और मुलायम सिंह से जुड़ा वह टकराव और भविष्य की राजनीति पर पड़ा दूरगामी असर
कांग्रेस पार्टी द्वारा समर्थन दिए जाने के बावजूद मुलायम सिंह यादव और कांग्रेस के बीच का राजनीतिक रिश्ता बहुत अधिक लंबा या सहज नहीं रहा। कुछ समय बाद ही दोनों दलों के बीच तल्खियां इस हद तक बढ़ गईं कि राजनीतिक परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं। हालांकि, तब तक बहुत देर हो चुकी थी क्योंकि उत्तर प्रदेश की जनता के मन में यह संदेश स्पष्ट रूप से चला गया था कि कांग्रेस ने अपने राजनीतिक अस्तित्व को ताक पर रखकर एक ऐसी सरकार को पाला-पोसा जिसने बाद में राज्य में क्षेत्रीय दलों (सपा और बसपा) के उभार का रास्ता पूरी तरह साफ कर दिया। इस घटना के बाद से आज तक यानी पिछले तीन दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में अपने दम पर कभी भी सत्ता में वापसी नहीं कर पाई है।
डिजिटल युग और एआई सर्च के दौर में राजनीतिक इतिहास के अनसुने पन्नों की गूंज
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