यूपी के हजारों टीचरों को मिलेगा 17000 रुपये मानदेय, इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश

यूपी के हजारों टीचरों को मिलेगा 17000 रुपये मानदेय, इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश

उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग और प्राथमिक विद्यालयों में वर्षों से मानदेय बढ़ोतरी की राह देख रहे हजारों अनुदेशकों (Instructors) और अंशकालिक शिक्षकों के लिए न्याय की चौखट से एक बेहद ऐतिहासिक और बड़ी राहतभरी खबर आई है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह यूपी के उच्च प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत हजारों अनुदेशकों को केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत 17,000 रुपये प्रतिमाह का संशोधित मानदेय 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ अविलंब भुगतान करे। हाईकोर्ट का यह कड़ा और ऐतिहासिक आदेश उन शिक्षकों के लिए एक बड़ी जीत माना जा रहा है जो पिछले कई वर्षों से अपने जायज हक और सम्मानजनक वेतन के लिए सड़कों से लेकर अदालतों तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे। न्यायमूर्ति की पीठ ने राज्य सरकार की उस याचिका और दलीलों को पूरी तरह से खारिज कर दिया जिसमें बजट की कमी और प्रक्रियात्मक देरी का हवाला देकर शिक्षकों के बढ़े हुए मानदेय को वर्षों से रोका गया था। कोर्ट के इस सख्त रुख के बाद अब बेसिक शिक्षा परिषद में हलचल तेज हो गई है और प्रदेश के लगभग 27,500 अनुदेशकों के खातों में जल्द ही बढ़ा हुआ मानदेय आने का रास्ता पूरी तरह से साफ हो गया है।

जानिए क्या है पूरा विवाद: साल 2017 से क्यों अटका था अनुदेशकों का 17,000 रुपये मानदेय?

उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग के उच्च प्राथमिक विद्यालयों (कक्षा 6 से 8) में खेल, कला, कंप्यूटर और कार्य शिक्षा जैसे विषयों के अध्यापन के लिए साल 2013 में संविदा पर अनुदेशकों की नियुक्ति की गई थी। शुरुआत में इन्हें बेहद मामूली 7,000 रुपये प्रतिमाह का मानदेय दिया जाता था। वर्ष 2017 में केंद्र सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय (MHRD - अब शिक्षा मंत्रालय) की प्रोजेक्ट अप्रूवल बोर्ड (PAB) की बैठक में अनुदेशकों के कार्य और महंगाई को देखते हुए उनके मानदेय को 7,000 रुपये से बढ़ाकर 17,000 रुपये प्रतिमाह करने की मंजूरी दी गई थी। केंद्र सरकार ने अपने अंशदान का बजट भी जारी कर दिया था, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य का अंशदान न मिलाते हुए अनुदेशकों को बढ़ा हुआ मानदेय देने से इनकार कर दिया और मानदेय को घटाकर पुनः 7,000 से 9,000 रुपये के आसपास ही सीमित रखा। इसके खिलाफ अनुदेशक संघ ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी: राज्य सरकार अपने ही शिक्षकों के अधिकारों का हनन नहीं कर सकती

मामले की विस्तृत सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की पीठ ने राज्य सरकार और बेसिक शिक्षा विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि जब केंद्र सरकार की सक्षम अथॉरिटी द्वारा अनुदेशकों के लिए 17,000 रुपये का मानदेय स्वीकृत किया जा चुका था, तो राज्य सरकार द्वारा उसे लागू न करना और स्वीकृत राशि को रोके रखना पूरी तरह से असंवैधानिक और अनुचित था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि एक लोक कल्याणकारी राज्य अपनी ही शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले शिक्षकों के साथ इस तरह का मनमाना व्यवहार नहीं कर सकता। अदालत ने राज्य सरकार की एकल पीठ के फैसले के खिलाफ दाखिल अपील को खारिज करते हुए आदेश दिया कि वर्ष 2017 से लेकर अब तक का अंतर (Arrears) अनुदेशकों को 9 फीसदी प्रतिवर्ष की ब्याज दर के साथ अदा किया जाए।

27,500 अनुदेशक परिवारों में छाई खुशी की लहर: दिवाली और त्योहारों से पहले बड़ा तोहफा

हाईकोर्ट का यह अंतिम फैसला आते ही पूरे उत्तर प्रदेश के अनुदेशक संघों और प्राथमिक शिक्षक संगठनों में जश्न का माहौल बन गया है। प्रयागराज, लखनऊ, वाराणसी, गोरखपुर, आगरा और कानपुर सहित प्रदेश के सभी 75 जिलों में कार्यरत लगभग 27,500 अनुदेशक पिछले 7-8 सालों से आर्थिक तंगी का सामना कर रहे थे। महंगाई के इस दौर में मात्र 9,000 रुपये में परिवार का गुजर-बसर करना उनके लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा था। कई अनुदेशक आर्थिक तंगी के कारण अन्य रोजगार तलाशने को मजबूर थे। अब हाईकोर्ट द्वारा 17,000 रुपये मानदेय के साथ एरियर भुगतान के कड़े आदेश के बाद इन शिक्षक परिवारों के चेहरे पर मुस्कान लौट आई है और उन्होंने इसे अपने लंबे संघर्ष व सत्य की सबसे बड़ी जीत बताया है।

बेसिक शिक्षा विभाग में हलचल: अवमानना से बचने के लिए बजट जारी करने की तैयारी तेज

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस कड़े रुख और 9 प्रतिशत ब्याज के साथ एरियर भुगतान के आदेश के बाद उत्तर प्रदेश शासन और बेसिक शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों में खलबली मच गई है। यदि सरकार समय सीमा के भीतर इस आदेश का पालन नहीं करती है, तो शिक्षा अधिकारियों के खिलाफ अवमानना (Contempt of Court) की कार्रवाई हो सकती है। सूत्रों के मुताबिक, बेसिक शिक्षा निदेशालय और वित्त विभाग ने कोर्ट के फैसले की समीक्षा शुरू कर दी है और एरियर की कुल राशि का आकलन किया जा रहा है जो करोड़ों रुपये में बैठेगी। शासन अब जल्द से जल्द कैबिनेट से मंजूरी लेकर अनुदेशकों के संशोधित मानदेय का बजट जारी करने की रूपरेखा तैयार कर रहा है ताकि अदालत में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल की जा सके।

शिक्षकों के सम्मान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा यह फैसला

संक्षेप में कहें तो, इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश केवल 17,000 रुपये मानदेय की बात नहीं है, बल्कि यह संविदा शिक्षकों के सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार (Right to Life) की संप्रभुता को पुनः स्थापित करता है। जब स्कूलों में पढ़ाने वाले अध्यापकों को उचित आर्थिक सुरक्षा मिलेगी, तभी वे पूरी निष्ठा और ऊर्जा के साथ सरकारी स्कूलों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे सकेंगे। उत्तर प्रदेश के हजारों अनुदेशकों की इस ऐतिहासिक अदालती जीत ने प्रदेश के अन्य संविदा कर्मचारियों के लिए भी एक नई उम्मीद की किरण जगा दी है, जो अपने नियमितीकरण और वेतन वृद्धि के लिए लंबे समय से प्रयासरत हैं।