जाति-धर्म से ऊपर उठकर मिला वोट, दरभंगा स्नातक सीट पर अनिल झा का 2 हजार वोटों से जीत का दावा
बिहार की राजनीति के गलियारों में इन दिनों विधान परिषद (MLC) की स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनावों ने गजब की सरगर्मी पैदा कर रखी है, जिसमें हर किसी की निगाहें मिथिलांचल के राजनीतिक केंद्र माने जाने वाले दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र (Darbhanga Graduates Constituency) पर टिकी हुई हैं। इस हाई-प्रोफाइल और प्रतिष्ठापूर्ण सीट पर मतदान संपन्न होने के बाद से ही सियासी तापमान लगातार परवान चढ़ रहा है। इस बीच, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के अधिकृत प्रत्याशी अनिल झा ने एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान अपनी जीत को लेकर बेहद चौंकाने वाला और बड़ा दावा पेश किया है। अनिल झा का कहना है कि उन्हें इस चुनाव में किसी एक विशेष जाति, वर्ग या धर्म के दायरे से पूरी तरह ऊपर उठकर राज्य के प्रबुद्ध मतदाताओं, शिक्षकों, वकीलों, डॉक्टरों और युवाओं का अपार और अभूतपूर्व समर्थन मिला है। उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ दावा किया है कि मतगणना के अंत में वह अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को दो हजार से अधिक मतों के स्पष्ट अंतर से मात देकर ऐतिहासिक जीत दर्ज करने जा रहे हैं। अनिल झा के इस बेबाक दावे के बाद से विरोधी राजनीतिक दलों के खेमे में भारी बेचैनी देखी जा रही है, और अब सभी की निगाहें आने वाली मतगणना की तारीख पर टिक गई हैं।
मिथिला की बौद्धिक नगरी में कड़ा मुकाबला: जातिगत समीकरणों को पीछे छोड़ शिक्षकों और युवाओं ने निभाई निर्णायक भूमिका
बिहार की राजनीति हमेशा से अपनी अनूठी जातिगत सरंचना और समीकरणों के लिए जानी जाती है, लेकिन विधान परिषद के स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव आम विधानसभा या लोकसभा चुनावों से पूरी तरह अलग होते हैं। यहाँ वोटर कोई आम नागरिक नहीं बल्कि यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट्स, शिक्षक और पेशेवर लोग होते हैं, जो किसी के बहकावे में आने के बजाय अपने विवेक और मुद्दों के आधार पर मतदान करते हैं। दरभंगा स्नातक सीट पर इस बार चुनाव प्रचार के दौरान विकास के मुद्दे, शिक्षित बेरोजगारों के भविष्य, पुरानी पेंशन योजना, विश्वविद्यालयों की बदहाल शैक्षणिक स्थिति और रोजगार के अवसरों जैसे गंभीर विषयों पर जमकर बहस हुई। अनिल झा ने अपने जनसंपर्क अभियानों के दौरान इन्हीं जमीनी मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाया और हर कॉलेज, यूनिवर्सिटी और कोचिंग संस्थानों तक पहुंचकर प्रबुद्ध वर्ग से सीधा संवाद स्थापित किया। यही कारण है कि उनके समर्थकों का मानना है कि इस बार मतदाताओं ने पारंपरिक बैरियर को तोड़कर शिक्षित नेतृत्व के पक्ष में अपना जनादेश दिया है।
अनिल झा का दो हजार वोटों की लीड का दावा: बूथवार आंकड़ों से समझें जीत का गणित
मतदान के तुरंत बाद राजनीतिक दलों द्वारा अपनी-अपनी जीत के दावे करना आम बात है, लेकिन अनिल झा द्वारा सीधे दो हजार वोटों के अंतर से जीत की बात कहना इस बात का संकेत देता है कि उन्होंने अपने बूथ मैनेजमेंट और अंदरूनी आकलन (Internal Assessment) पर बहुत बारीकी से काम किया है। मतदान के दिन दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर और बेगूसराय के कुछ हिस्सों में फैले इस निर्वाचन क्षेत्र के विभिन्न मतदान केंद्रों पर ग्रैजुएट मतदाताओं में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला था। युवा और महिला मतदाताओं ने बढ़-चढ़कर अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। अनिल झा की चुनावी टीम के अनुसार, शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों के पढ़े-लिखे युवाओं और कामकाजी वर्ग ने भाजपा के पक्ष में एकतरफा मतदान किया है। यदि यह दावा सच साबित होता है, तो यह मिथिलांचल के क्षेत्र में भाजपा संगठन के लिए एक बहुत बड़ी और मनोवैज्ञानिक बढ़त मानी जाएगी।
विपक्ष की प्रतिक्रिया और धड़कनें तेज: अब मतगणना के दिन का हो रहा है बेसब्री से इंतजार
जैसे ही अनिल झा का यह बयान मीडिया और राजनीतिक गलियारों में वायरल हुआ, विपक्षी दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के खेमे में हलचल तेज हो गई। विपक्षी दलों के नेताओं का कहना है कि मतगणना से पहले इस तरह के बड़े दावे करना महज मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की एक रणनीति है और असली तस्वीर तो मतगणना की पेटियां खुलने के बाद ही साफ होगी। हालांकि, अंदरखाने विपक्षी खेमे में भी इस बात को लेकर सुगबुगाहट शुरू हो गई है कि स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में इस बार जमीनी स्तर पर सत्ता पक्ष के प्रति जो रुझान देखा गया, उसने उनके समीकरणों को हिलाकर रख दिया है। दरभंगा के प्रशासनिक अमले ने भी मतगणना को निष्पक्ष, शांतिपूर्ण और पारदर्शी तरीके से संपन्न कराने के लिए पूरी तैयारी कर ली है और सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके।
बिहार की राजनीति पर पड़ेगा इस चुनाव परिणाम का दूरगामी प्रभाव
संक्षेप में कहें तो, दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का यह चुनाव केवल एक विधान पार्षद की सीट जीतने या हारने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में बिहार की राजनीतिक दिशा और प्रबुद्ध वर्ग के मूड को मापने का एक बड़ा पैमाना बन चुका है। यदि अनिल झा अपने इस दावे के मुताबिक शानदार जीत दर्ज करने में सफल रहते हैं, तो यह भाजपा के केंद्रीय और प्रांतीय नेतृत्व की रणनीतिक सफलता के साथ-साथ शिक्षित समाज के बीच पार्टी की बढ़ती स्वीकार्यता का प्रमाण होगा। अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि जब स्ट्रॉन्ग रूम के ताले खुलेंगे और वोटों की गिनती शुरू होगी, तो क्या वास्तव में अनिल झा का यह दो हजार वोटों की जीत का दावा सच में तब्दील हो पाता है या फिर जनता का फैसला कुछ और ही कहानी बयां करता है।