68,500 शिक्षक भर्ती के वे कौन से आदेश हैं जिन्हें लागू कराने के लिए सड़कों पर उतरे अभ्यर्थी
उत्तर प्रदेश की राजनीति और शिक्षा जगत के गलियारों में एक बार फिर से सहायक अध्यापक भर्ती प्रक्रिया को लेकरवान तनाव और संघर्ष का माहौल देखने को मिल रहा है, जहां लंबे समय से न्याय की आस लगाए बैठे 68,500 शिक्षक भर्ती के आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी सड़क पर उतरने को मजबूर हो चुके हैं। राजधानी लखनऊ से लेकर विभिन्न प्रशासनिक कार्यालयों तक इन दिनों इन युवाओं का गुस्सा साफ तौर पर फूट रहा है, जिनकी सिर्फ एक ही मांग है कि राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा दिए गए स्पष्ट और तथ्यात्मक आदेश को फौरन शासनादेश के जरिए लागू किया जाए। आज से लगभग आठ साल पहले यानी 2018 में विज्ञापित की गई इस बहुचर्चित शिक्षक भर्ती में आरक्षण के नियमों और कटऑफ अंकों को लेकर जो पेच फंसा था, वह वक्त के साथ और अधिक गहराता चला गया है, जिससे हजारों योग्य युवाओं का भविष्य अधर में लटका हुआ है। इस संपूर्ण घटनाक्रम ने एक बार फिर से सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली और संवैधानिक आयोगों के निर्देशों के पालन पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे यह पूरा मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया और जनमानस की सुर्खियों में बना हुआ है।
आखिर क्या था राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का वह आदेश जिसे लागू कराने के लिए सड़कों पर उतरे हैं अभ्यर्थी
इस पूरे विवाद के केंद्र में राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का वह ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण आदेश है जो उसने लंबी कानूनी और तथ्यात्मक सुनवाई के बाद पारित किया था। प्रदर्शनकारी अभ्यर्थियों और पीड़ित युवाओं के अनुसार, वर्ष 2018 में जब 68,500 सहायक शिक्षक भर्ती की मूल नियमावली और विज्ञापन जारी किया गया था, तब उसमें अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी (OBC), अनुसूचित जाति (SC), दिव्यांग और भूतपूर्व सैनिकों को भर्ती परीक्षा के पासिंग मार्क्स या न्यूनतम अर्हता अंकों में 5 प्रतिशत की विशेष छूट दिए जाने का स्पष्ट प्रावधान तय किया गया था। लेकिन जब इस परीक्षा का अंतिम परिणाम घोषित किया गया, तो आरोप लगा कि जिम्मेदार अधिकारियों ने आरक्षित वर्ग को मिलने वाली इस 5 प्रतिशत की निर्धारित छूट को दरकिनार कर दिया और उन्हें सामान्य वर्ग के समान ही उच्च कटऑफ के दायरे में खड़ा कर दिया। इस गंभीर अनियमितता और कथित आरक्षण विसंगति के खिलाफ जब प्रभावित अभ्यर्थी राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के दरवाजे पर पहुंचे, तो आयोग ने तमाम साक्ष्यों, शासनादेशों और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) की गाइडलाइन का बारीकी से अध्ययन किया। इसके बाद आयोग ने अपने आदेश में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि 150 अंकों के कुल पूर्णांक में आरक्षित वर्ग को 5 प्रतिशत की छूट का लाभ मिलना ही चाहिए था, जिसके तहत 60 अंक यानी 40 प्रतिशत कटऑफ पाने वाले ओबीसी और अन्य आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों को परीक्षा में सफल माना जाए। आयोग ने अपनी संस्तुति में यह भी निर्देश दिया था कि बेसिक शिक्षा विभाग तुरंत इस आधार पर परीक्षा परिणाम को संशोधित करे, एक नई चयन सूची तैयार करे और वंचित तथा योग्य अभ्यर्थियों को तत्काल प्रभाव से सरकारी शिक्षक के रूप में नियुक्ति प्रदान करे।
क्यों नहीं लागू हो पा रहा है आयोग का आदेश और मंत्रियों के आश्वासनों के बाद भी क्यों जारी है विरोध प्रदर्शन
सबसे बड़ा और हैरान करने वाला सवाल यह है कि जब राज्य और राष्ट्रीय स्तर के पिछड़ा वर्ग आयोग ने अपनी जांच में इस बात की आधिकारिक पुष्टि कर दी है कि भर्ती प्रक्रिया में नियमों के तहत छूट नहीं दी गई, तो फिर शासन स्तर पर इस आदेश का अनुपालन क्यों नहीं कराया जा रहा है? पिछले दिनों राजधानी लखनऊ में जब अभ्यर्थियों का प्रतिनिधिमंडल राज्य के बेसिक शिक्षा मंत्री और अन्य उच्चाधिकारियों से मिला था, तो बैठकों के दौरान इस बात पर लंबी चर्चा हुई थी कि नियमों के क्रियान्वयन में त्रुटि तो हुई है। मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से यह माना भी गया कि आयोग की रिपोर्ट में उठाए गए बिंदु तार्किक हैं, और इसके समाधान के लिए उच्च स्तर पर मुख्यमंत्री के समक्ष फाइल रखे जाने का आश्वासन भी दिया गया। लेकिन कागजी वार्ताओं और केवल मौखिक आश्वासनों के इस अंतहीन खेल से तंग आकर अब युवाओं का धैर्य पूरी तरह से जवाब दे चुका है, क्योंकि पिछले आठ वर्षों से वे लगातार शिक्षा निदेशालय से लेकर शासन के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं। अभ्यर्थियों का यह साफ कहना है कि जब तक बेसिक शिक्षा विभाग राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के 40 प्रतिशत कटऑफ वाले आदेश का औपचारिक शासनादेश जारी करके संशोधित सूची सार्वजनिक नहीं करता, तब तक उनका यह संघर्ष और आंदोलन किसी भी कीमत पर थमने वाला नहीं है।
डिप्टी सीएम आवास के बाहर उमड़ा अभ्यर्थियों का जनसैलाब और पुलिस प्रशासन के साथ तीखी झड़प का पूरा घटनाक्रम
अपनी मांगों को लेकर लंबे समय से शांतिपूर्ण धरना दे रहे इन अभ्यर्थियों का गुस्सा उस वक्त सातवें आसमान पर पहुंच गया जब उन्हें लगा कि सरकार मामले को टालने की कोशिश कर रही है। शनिवार की सुबह अहले सुबह ही हजारों की संख्या में 68,500 शिक्षक भर्ती के पीड़ित अभ्यर्थी उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के सरकारी आवास के बाहर जा पहुंचे और वहां जोरदार नारेबाजी शुरू कर दी। प्रदर्शनकारियों ने 'पिछड़ा आयोग ने माना है, आरक्षण घोटाला है' जैसे गगनभेदी नारे लगाकर पूरे इलाके में प्रशासनिक हलचल तेज कर दी। अचानक हुए इस उग्र प्रदर्शन को देखकर स्थानीय पुलिस और सुरक्षा बलों के हाथ-पांव फूल गए, जिसके बाद भारी पुलिस बल मौके पर तैनात किया गया। आवास के बाहर प्रदर्शनकारियों को खदेड़ने और रोकने के दौरान पुलिस और बेरोजगार युवाओं के बीच तीखी नोकझोंक, खींचतान और धक्का-मुक्की का दौर भी देखने को मिला। प्रदर्शन कर रहे युवा इस बात पर अड़े हुए थे कि जब तक शासन का कोई जिम्मेदार नुमाइंदा मौके पर आकर लिखित में यह आश्वासन नहीं देता कि आयोग के आदेश को इसी सत्र में लागू किया जाएगा, वे वहां से टस से मस नहीं होंगे। हालांकि बाद में भारी पुलिस बल ने बलपूर्वक या समझा-बुझाकर इन प्रदर्शनकारियों को बसों में भरकर इको गार्डन धरना स्थल की ओर रवाना कर दिया, लेकिन इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि राज्य के युवाओं के भीतर सिस्टम के खिलाफ कितना भारी असंतोष सुलग रहा है।
प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका पर उठे सवाल और भविष्य की राजनीतिक व कानूनी लड़ाई का नया मोड़
इस पूरे प्रकरण ने उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था और न्याय प्रक्रिया पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है कि आखिर एक संवैधानिक संस्था यानी राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के आदेश को लागू कराने के लिए राज्य के शिक्षित युवाओं को सड़क पर उतरकर लाठियां खाने और धक्के खाने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ रहा है। आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट में यहां तक सिफारिश की थी कि जिन अधिकारियों या कर्मचारियों की लापरवाही या मनमानी के कारण आरक्षित वर्ग के अधिकारों का हनन हुआ है और नियमावली के विपरीत परिणाम जारी किए गए हैं, उनकी भी जवाबदेही तय की जानी चाहिए तथा उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन इसके बावजूद फाइलें एक टेबल से दूसरी टेबल पर घूमती रहती हैं और न्याय की आस में कई अभ्यर्थियों की उम्र निकलती जा रही है। जानकारों का मानना है कि यदि सरकार ने समय रहते इस मामले पर कोई ठोस और पारदर्शी निर्णय नहीं लिया, तो यह आंदोलन आने वाले दिनों में और अधिक विकराल रूप धारण कर सकता है, जो आगामी राजनीतिक समीकरणों के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन सकता है। फिलहाल सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मुख्यमंत्री स्तर से इस मामले में क्या अंतिम निर्देश जारी होते हैं और क्या वाकई उन 68,500 भर्ती के वंचित और योग्य अभ्यर्थियों को उनका हक मिल पाता है या नहीं।