योगी, अखिलेश या मायावती; यूपी में किस सरकार ने बदले सबसे ज्यादा नाम

योगी, अखिलेश या मायावती; यूपी में किस सरकार ने बदले सबसे ज्यादा नाम

उत्तर प्रदेश की राजनीति में नाम बदलने की परंपरा लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। राज्य में सरकार बदलने के साथ कई बार जिलों और शहरों के नामों को लेकर बड़े फैसले लिए गए हैं।

हाल ही में भदोही का नाम दोबारा बदलकर ‘संत रविदास नगर’ किए जाने की घोषणा के बाद यह मुद्दा फिर सुर्खियों में आ गया है। इससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या नाम बदलना सिर्फ पहचान और संस्कृति से जुड़ा कदम है या फिर इसके पीछे राजनीतिक संदेश भी छिपा होता है।

मायावती ने बदले थे इन जिलों के नाम

उत्तर प्रदेश में नाम बदलने की राजनीति को सबसे बड़ा विस्तार बीएसपी की मायावती सरकार के समय मिला। साल 2010-11 के दौरान उनकी सरकार ने एक साथ नौ जिलों के नाम बदल दिए थे। इस फैसले के पीछे सरकार का तर्क था कि दलित, पिछड़े और बहुजन समाज से जुड़े महापुरुषों को सम्मान देना जरूरी है। इसी क्रम में अमेठी का नाम छत्रपति शाहूजी महाराज नगर, कासगंज का कांशीराम नगर, कानपुर देहात का रमाबाई नगर, अमरोहा का ज्योतिबा फुले नगर और हाथरस का महामाया नगर किया गया। इसके अलावा भदोही, हापुड़, शामली और संभल के नाम भी बदले गए थे।

फिर अखिलेश के फैसले ने सभी को चौंकाया

मगर 2012 में सत्ता परिवर्तन के बाद समाजवादी पार्टी की अखिलेश यादव सरकार ने मायावती सरकार के इन फैसलों को वापस ले लिया। सपा सरकार ने सभी बदले गए जिलों के पुराने नाम फिर से लागू कर दिए। सरकार का कहना था कि पुराने नाम जनता के बीच ज्यादा लोकप्रिय थे और नए नामों से प्रशासनिक कामकाज में परेशानी हो रही थी।

2017 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने के बाद नाम बदलने की राजनीति ने एक अलग दिशा ले ली। योगी आदित्यनाथ सरकार ने इसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखा। इस दौरान इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज और फैजाबाद का नाम अयोध्या किया गया। अब भदोही को फिर से संत रविदास नगर नाम देने की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है।

हालांकि किसी जिले या शहर का नाम बदलना आसान प्रक्रिया नहीं होती। इसके लिए राज्य सरकार को प्रस्ताव तैयार कर केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय को भेजना होता है। मंजूरी और आधिकारिक अधिसूचना जारी होने के बाद ही नया नाम कानूनी रूप से लागू होता है।

नाम बदलने के फैसलों को लेकर लोगों की राय अलग-अलग है। समर्थकों का मानना है कि नाम किसी क्षेत्र की संस्कृति और इतिहास को सम्मान देते हैं। वहीं आलोचकों का कहना है कि सिर्फ नाम बदलने से विकास नहीं होता। जनता को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बेहतर सुविधाओं की ज्यादा जरूरत है। ऐसे में यूपी की राजनीति में नाम बदलना हमेशा पहचान और विकास के बीच बहस का विषय बना रहेगा।

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