सांसों में घुल रहा है धीमा जहर! दून में 460 पहुंचा था AQI, इस दिवाली फेफड़ों को तबाह कर देंगी ये जहरीली गैसें
दिवाली की रात आसमान को सतरंगी रोशनी से नहलाने वाले पटाखे देखने में जितने लुभावने लगते हैं, उनके पीछे उतना ही गंभीर पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संकट छिपा रहता है। पटाखों में मनमोहक रंग पैदा करने के लिए बेरियम, स्ट्रॉन्शियम, कॉपर, सोडियम, एल्युमिनियम और मैग्नीशियम जैसी कई जहरीली धातुओं के रासायनिक यौगिक मिलाए जाते हैं, जो जलने के बाद न केवल हवा को विषैला बनाते हैं बल्कि मिट्टी और भूमिगत जल को भी दूषित कर देते हैं।
इन रासायनिक अवशेषों का सीधा और घातक असर इंसान की आंखों, फेफड़ों, त्वचा और पाचन तंत्र पर पड़ता है। पिछली दिवाली पर देहरादून के दून विश्वविद्यालय क्षेत्र में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) का स्तर खतरनाक रूप से 460 तक पहुंच गया था, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि पटाखों से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी गैसें आबोहवा को किस हद तक जहरीला बना देती हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक पटाखों से निकलने वाले पीएम 2.5 जैसे अति सूक्ष्म कण सांस के जरिए फेफड़ों की गहराई तक पहुंचकर अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, लगातार खांसी और सांस फूलने जैसी गंभीर व्याधियां पैदा करते हैं। साथ ही यह जहरीला धुआं आंखों में तेज जलन, गले में खराश और रक्त वाहिकाओं पर दबाव बढ़ाकर दिल के दौरे का जोखिम कई गुना बढ़ा देता है, जिसका सबसे बुरा असर छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और सांस के पुराने मरीजों पर देखा जाता है।
दून विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. विजय श्रीधर और उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) के सदस्य सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते ने चेतावनी दी है कि दिवाली के दौरान प्रदूषण का स्तर सामान्य दिनों के मुकाबले चार गुना तक बढ़ जाता है। उन्होंने आम जनमानस से पर्यावरण और व्यक्तिगत स्वास्थ्य की सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए रंगीन रोशनी बिखेरने वाले और तेज धमाके वाले पटाखों से पूरी तरह दूरी बनाने की अपील की है।